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14 साल की उम्र में किए गए अपराध के लिए 25 साल जेल में बिताने वाले एक व्यक्ति को रिहा करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भारत के किशोर न्याय ढांचे में व्यवस्थागत विफलताओं की एक कठोर याद दिलाता है। अपराध के समय नाबालिग रहे इस व्यक्ति को किशोर न्याय कानूनों के तहत गारंटीकृत सुरक्षा से वंचित किया गया और सभी स्तरों पर अदालतें लगातार उसे किशोर के रूप में मान्यता देने में विफल रहीं। शीर्ष अदालत ने, जो “घोर अन्याय” हुआ था, उसे स्वीकार करते हुए न केवल उसकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया, बल्कि उत्तराखंड सरकार और राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण को उसके पुनर्वास और पुनः एकीकरण की सुविधा प्रदान करने का भी निर्देश दिया। किशोरों के अधिकारों को बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट का आह्वान

13 Jan 2025 11:06AM,
by: Babuaa Desk