टाटा, रतन टाटा...
लेखक- संजय दुबे

मैने रतन टाटा को कभी भी देश का सबसे प्रतिष्ठित उद्योगपति नहीं माना बल्कि सबसे प्रतिष्ठित दिलदार व्यक्ति माना जिसने धन के बजाय जन से बे इंतिहा मोहब्बत की। दुनियां में पैसे कमाने वाले करोड़ो लोग है लेकिन वे इसलिए याद रखे जाते है कि उनकी कंपनी ने साल में कितना मुनाफा कमाया या कितना घाटा हुआ।देश की बैंको से कितना कर्ज लिया, कितना एनपीए का लाभ लिया।जनता से कितना पैसा शेयर के रूप में लिया,लाभ दिलाया या डूबा दिया। कुछ औधोगिक घरानों को हम वैभव का असीमित प्रदर्शन करते हुए भी देखते है जो पारिवारिक कार्यक्रमों का सार्वजनीकरण करते है कि ऊब होने लगती है कि पारिवारिक कार्यक्रम है या ऐसा दिखावा जिससे दिखावा करने वाला परिवार ही उपहास और हास्य का प्रतिमान बन जाता है। टाटा परिवार ,इस देश की रीढ़ की हड्डी के रूप में स्थापित है। टाटा परिवार के संस्थापक ने इस देश के प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को दूसरी पंच वर्षीय योजना को उद्योग प्रमुख होने का साहस दिया। कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अगर देश उद्योगों के मामले में आत्म निर्भर हो रहा है तो इसकी बुनियाद टाटा परिवार ने ही रखी थी। अंग्रेजो ने भारत को इतना अशक्त बना दिया था कि सुई के लिए भी दूसरो पर निर्भर रहना पड़ता था।
टाटा परिवार की नई पीढ़ी में रतन टाटा का आना ,टेक्नोलोजी का भी आना था। देश को 1991 में पी वी नरसिम्हा राव जैसे प्रधान मंत्री और मनमोहन सिंह जैसे कुशाग्र वित्त मंत्री मिले और इनके प्रगतिशील विचार ने अंतराष्ट्रीय कंपनी के लिए भारत के द्वार खोले तो देश महज तीन दशक में इतना तो सक्षम हो गया है कि यहां के कुशाग्र बुद्धि वाले युवक युवतियां संभावना के बाजार में खुद को स्थापित कर सके।
किसी भी उद्योग का सरकारीकरण हमेशा से त्रासदीदायक रहा है। दरअसल कार्यपालिका में बैठे अधिकांश लोग परंपरावादी या दकियानूस होते है।मठ्ठर बुद्धि के चलते इफ बट में उलझना इनकी शगल होती है। इसी कारण छत्तीसगढ़ को ही ले तो राज्य स्थापना के चौबीस साल बाद भी एक आई टी कंपनी नही खुल पाई है। खैर,एक राज्य के बजाय राष्ट्र को देखे तो दुनियां के पांच शक्तिशाली देशों के समकक्ष खड़ा करने में रतन टाटा का योगदान न भूलने वाला या कहे न भुलाने वाला रहेगा।
जीवन के किसी भी कदम पर जोखिम लिए बगैर सफलता असफलता का निर्धारण नही हो सकता ये रतन टाटा ने अपने और आने वाली पीढ़ी को सीख दी है।
रतन टाटा एक उद्योगपति ही रहते तो उनका आंकलन सादे तौर पर होते लेकिन वे लोहा के प्रमुख कारोबारी होने के अलावा एक संजीदा इंसान थे।उन्होंने मानव सेवा को अपना लक्ष्य बनाया था और देश भर के जरूरतमंदो की मदद किया करते थे। कुछ समय पहले एक फिल्म आई थी श्रीकांत बोल्ला ।ये फिल्म एक विलक्षण व्यक्ति जो जनामंध था उसे सुपारी के व्यवसाय एम रतन टाटा ने मदद कर स्थापित किया था आम भारतीयों के लिए नैनो कार की परिकल्पना रतन टाटा की ही थी। क्या किसी अन्य कार बनाने वाले किसी अन्य उद्योगपति के जेहन में ऐसी बात आई थी?
देश के लाखो होनहार प्रतिभावान विद्यार्थियों को रतन टाटा न आई टी कंपनी सहित दीगर कम्पनी में रोजगार दिया है।
कल रात में देश के अनमोल रतन टाटा ने नश्वर संसार को टाटा कह दिया।कुछ व्यक्तियों के जाने का दुख हर किसी को होता है। रतन टाटा ऐसे ही व्यक्ति रहे देश का हर नागरिक उनके प्रति कृतज्ञ है।

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