हार की जीत
संजय दुबे
ये कहानी सुदर्शन द्वारा 1920 में लिखी गई है। सुदर्शन जी कहानी में बाबा भारती, डाकू खड़क सिंह और सुल्तान घोड़ा मुख्य पात्र है। कहानी में डाकू खड़क सिंह द्वारा विकलांग बन घोड़े को छीन कर ले जाने की है।
बाबा भारती के ये कहने पर कि इस घटना का जिक्र किसी से न करना अन्यथा लोगों के द्वारा सहयोग करने की भावना में कमी आ जाएगी। सुल्तान डाकू का हृदय परिवर्तन होता है और कुछ दिनों बाद वह अंधेरी रात में बाबा भारती के घर में चुपचाप घोड़ा बांध कर चला जाता है।
हार की फिर जीत इंदौर के रघु सेठ का प्लाई का अच्छा खासा कारोबार था। एक बेटा विनीत और बेटी सुनीता पढ़ाई पूरा कर पिता के व्यवसाय में हाथ बटाते थे। विनीत प्लाई के कच्चा माल से लेकर सारे निर्माण कार्य को देखता।सुनीता कर्मचारियों की नियुक्ति से लेकर वेतन और पैसे के लेन देन का काम देखती।
सबके सहयोग से व्यवसाय में दिन दुगनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही थी।रघु को इस बात का गर्व था कि उनकी संताने आदर्श स्थापित कर रही है। रघु, जब कभी सुनीता को काम में व्यस्त देखते तो उनके मन में आता कि जब इसकी शादी हो जाएगी तो कौन इसकी जगह लेगा? दोपहर का वक्त था।रघु और सुनीता बैठकर चाय पी रहे थे।एक युवक का आगमन हुआ। "मालिक प्रणाम, कई दिनों से बेरोजगार हूं कोई काम मिल जाता, मै ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूं लेकिन हिसाब किताब जानता हूं।ईमानदार हूं,जो काम देंगे आदेश मान कर करूंगा।" "ये मेरी बेटी सुनीता है यही कर्मचारी रखती है। अगर इसको तुम जँच गए तो ठीक नहीं तो राम जाने" रघु इतना कह चले गए "पहले कही काम किए हो"सुनीता ने युवक को ध्यान से देखते हुए पूछा "जी दीदी, थोक कपड़ा दुकान में दिन से लेकर रात तक काम करता था।
सुबह पेपर बांटता था।" "कपड़ा दुकान से क्यों निकाले गए?" "मालिक ने दूसरे शहर में बड़ा काम शुरू किया हैं। मेरे पिता नहीं है।घर में मां और दो बहन थी।एक की शादी हो गई है। परिवार का बोझ मुझ पर है। मै शहर छोड़ कर नहीं जा सकता। अभी सिर्फ पेपर बांट रहा हूं उससे घर नहीं चल पा रहा है।" "मेरे यहां छोटा काम है ।ईमानदारी का है।रोज आठ दस जगह पैसे भेजने पड़ते है। चार हजार रुपए वेतन है। करोगे?" "जी दीदी", "ठीक है कल से 11बजे आ जाना।और हां मैं गुस्सैल बहुत हूं ।काम में लापरवाही किए तो खैर नहीं समझे।
क्या नाम है तुम्हारा " "मोहन, दीदी" दो साल गुज़र गए थे।मोहन ने अपनी ईमानदारी और मेहनत से घर के सभी सदस्यों का विश्वास जीत लिया था। एक दिन रघु ने सुनीता से पूछा "ये मोहन बहुत मेहनती है ईमानदार है।ये सच है या ढोंग भी है।" "ऐसा क्यों लगा पापा आपको?सुनीता ने पूछा बेटा,पके आम में ही कीड़ा लगता है।हो सकता है मै गलत भी होऊं। सुनीता ने मोहन को बुलाकर पूछा "क्यों मोहन, तुम खाली मेहनती हो,ईमानदार हो या ढोंग करते हो।हम लोगों का विश्वास जीतने के लिए।" "दीदी, दो साल में कभी आपको ऐसा लगा क्या।आपने जैसा कहा मैने वैसा किया ।कभी एक पैसे का इधर उधर नहीं किया।," "पापा कह रहे थे इस कारण सीधा पूछ लिया समझे।कभी गड़बड़ मत करना और हां तुम्हारा वेतन सात हजार कर दी हूं।" "जी" सुनीता ने मोहन को ध्यान से देखा चार महीने बाद घर में हलचल थी। "रघु ने मोहन को बुलाया देख मोहन, सुनीता की शादी पक्की हो गई है। छः महीने बाद होगी।यही का लड़का है।ट्रांसपोर्ट का काम है।तुम सुनीता का हाथ बटाना और काम भी समझ लो।आगे तुम ही देखना।सुनीता बोल रही थी कि तुम विश्वास करने लायक हो।
उसकी शादी के बाद एकाउंटेंट का काम तुम्हे करने के लिए कही है।हमारे यहां अकाउंटेंट को अठारह हजार वेतन मिलता है। ठीक है।" "जी बाबू जी" एक सप्ताह बाद सुनीता फैक्ट्री आई। मोहन ने देखा ।सुनीता के चेहरे पर शादी की खुशी नहीं थी। "दीदी, बधाई हो और आपका धन्यवाद जो मेरे लिए सोचे कि आपकी शादी के बाद मैं फैक्ट्री में एकाउंटेंट का काम करूंगा" "जाओ अपना काम करो। मेरा मूड ऑफ है। जाओ।" दीदी, बाबू जी ने कहा है कि आप जो कहे वो मुझे करना है। आपका हाथ बटाना है।" "मै जो कहूंगी वो करोगे ,जो भी।" "जी दीदी" "दो दिन सोच कर बताना, जाओ यहां से" दो दिन गुजार चुके थे दो दिन तक मोहन पशोपेश में रहा कि दीदी कौन से काम को करने के लिए कहेगी।
नहीं करते बना तो नौकरी हाथ से निकल जाएगी। तीसरे दिन सुनीता ने मोहन को शहर से दूर एक होटल में बुलाया। "दीदी, यहां क्यों बुलाए मुझे। फैक्ट्री में ही बता देती।" आज से तुम मुझे दीदी नहीं कहना।मै पिछले पांच महीने से तुम्हे चाहने लगी हूं।ये बात किसी को नहीं बताई हूं। तुमने कहा है कि मैं जैसा कहूंगी वैसा करोगे।इसलिए ध्यान से सुनो मगर दीदी, मैने आपको कभी बहन के रिश्ते से अलग देखा नहीं।दो साल से आप फैक्ट्री के मजदूरों को राखी बांधती रही है मै भी राखी बंधवाया हूं।" "धागा बांध देने से हर कोई भाई बहन नहीं हो जाते।समझे। मुझे ये शादी नहीं करनी है। मै पापा की बात टाल नहीं सकती। मां को कही तो बोलती है 26साल की हो रही है। ऐसे ही देर हो गई है। कुछ करो।अगर मेरी बात नहीं माने तो देख लेना" मोहन पशोपेश में था। "क्या सोच रहे हो।जिंदगी भर दौड़ते रहोगे या अच्छी जिंदगी भी जीयोगे।
सोचो मेरे साथ की जिंदगी में हर सुख होगा।" "दीदी" "मत कहो दीदी,सुनीता कहो" आप मालकिन है,नाम नहीं ले सकता।आप गलत कर रही है।आपके घर में पता चलेगा तो मुझे धोखेबाज, बेईमान, जिस थाली में खाया उसमें छेद करने वाला कहेंगे। "मै कुछ नहीं जानती" "आप घर में शादी करने से मना कर दीजिए। लड़का पसंद नहीं है तो बता दीजिए।" ये हल नहीं है।एक हल है कि अगर मेरा होने वाला पति शादी के बाद मर जाए तो मेरी दूसरी शादी तुमसे हो सकती है।" "मगर आपके होने वाले पति शादी के बाद मरेंगे क्यों?" "हम मारेंगे उसको।" " क्या बात कर रही है आप! किसी निर्दोष आदमी की हत्या क्यों करेंगी।" "यही रास्ता है मेरे पास।तुम्हारे पास।हम दोनों के पास।" "मै किसी की हत्या नहीं कर सकता।मुझे मंजूर नहीं।" "ठीक है। तुम पर चोरी का आरोप लगेगा। हमारे खाते से एक लाख रुपए कम मिलेंगे।तुम्हारा खेल खत्म।चोर को कोई नौकरी नहीं देगा आगे" मोहन समझ चुका था कि सुनीता के दिमाग में क्या चल रहा है।
मानो तो भी गलत न मानो तो सत्यानाश। "मुझे समय चाहिए।" चार दिन बाद इसी होटल में आ कर बता देना।मोहन ,मै तुम्हे बहुत चाहती हूं।आई लव यू सो मच और हां तुम जानते हो मैं ना सुनने की आदी नहीं हूं।" मोहन होटल से बाहर निकल चुका था अपने कुछ पुराने दोस्तों की याद आई।उनसे मिलने चला गया।बातों बातों में उदाहरण से जिस स्थिति में वो था उसमें वे रहते तो क्या करते? दोस्तो ने हाथ आए अवसर को नहीं छोड़ते की बात कह गए। तीन दिन मोहन फैक्ट्री में गया। सुनीता नहीं दिखी। मन में आया कि मालिक को बता दे।फिर याद आया कि सुनीता ने झूठे मामले में फंसा दिया तो मालिक भी चोर ही समझेंगे। चौथे दिन मोहन , सुनीता के बताए होटल में पहुंचा।सुनीता पहले ही पहुंच गई थी। क्या सोचा तुमने मोहन? "मुझे दो दिन का समय और चाहिए मालकिन" "मालकिन, नाम लो मेरा सुनीता, समझे।" "सुनीता जी, मुझे दो दिन चाहिए।मै निर्णय नहीं पा रहा हूं।बस दो दिन और।"
मै तुम्हे समय देती हूं लेकिन मैं क्या सुनना चाहती हूं तुम जानते हो।मै ना सुनने की आदी नहीं हूं।" "जी" शाम 7बजे सुनीता के भाई विनीत के पास अज्ञात नंबर से फोन आया।एक होटल में अकेले मिलने की बात थी। विनीत, शाम 7बजे बताए गए होटल में पहुंच चुका था। होटल में विनीत मोहन को देखकर हरप्रभ हो गया। "मोहन, अज्ञात नंबर से तुमने कॉल किया था।" "हां भैया" "तुम अपने नंबर से कॉल कर सकते थे।" भैया, पिछले सात दिन से बहुत परेशान हूं।आपको जो बात बताने जा रहा हूं उसे पूरा सुन लीजिएगा।समझ लीजिएगा।मै गलत होऊंगा तो चार थप्पड़ लगा दीजिएगा लेकिन मेरी पूरी बात सुनने के बाद ही।आप आवेश में मत आइएगा क्योंकि जो बात बताने जा रहा हूं उसका हल बड़ी शांति से आप परिवार वालों को करना होगा। "कौन सी बात बता जल्दी" "भैया, आप लोग बहुत मुसीबत के समय मुझे सहारा देने वाले है।
भगवान के बाद मैं आप लोगों को ही मानता हूं। मै आपके परिवार का कर्जदार हूं।एहसानमंद हूं, अहसानफरामोश नहीं बनना चाहता। धोखेबाज नहीं कहलाना चाहता,बेईमान नहीं कहलाना। मै ये भी जानता हूं कि जो बात आपको बताने जा रहा हूं उसके बाद मेरी नौकरी खत्म हो जाएगी।मै खुद ही कल से नहीं आऊंगा। मै ऐसे भी नौकरी छोड़कर जा सकता था लेकिन उस स्थिति में मुझे पैसे की हेराफेरी का आरोप लगता । पुलिस ने रिपोर्ट होती और मै जेल भी जाता" "ये क्या बहकी बहकी बात कर रहा है मोहन" मोहन से सुनीता का पूरा सच बता दिया। आप लोग मालिक है भैया।दीदी के मन में ये बात क्यों आई मै नहीं जानता लेकिन मैने राखी बंधवाई है।भाई बहन के रिश्ते को समझता हूं।मेरी भी एक बहन है। आप दीदी को कैसे समझाएंगे।ये आप पर है। मै बाबू जी को बताने की सोचा था लेकिन उनके दिल पर क्या गुजरती ये सोचकर आपको बता दिया। भैया जिस थाली में खाना मिलता है उसमें छेद करने का अधिकार नहीं है। मै पूरे परिवार सहित आज रात कही दूर जा रहा हूं। मुझ पर चोरी का इल्ज़ाम न लगे ये आप देख लीजिएगा।" मोहन, आज तुमने ये बात बता कर हमारे परिवार की इज्जत बचा ली,अपनी इज्जत बढ़ा ली है।तुम्हारा एहसान हमारे परिवार पर रहेगा। एक बात पूछना तो नहीं चाहिए लेकिन पूछ रहा हूं। एक करोड़पति लड़की तुम्हे जीवन साथी बनने का ऑफर दे रही है तुम लालच में क्यों नहीं आए? भैया, जिस परिवार ने सहारा दिया वहां ऐसी सोच ही बुरी है। ऐसा करने से बहुत से जरूरतमंद लोगों के साथ भी तो बुरा होता।उनको नौकरी नहीं मिलती।बाबू जी को कई बात कभी नहीं बताइएगा।उनकी उम्र हो चुकी है।शायद बर्दाश्त न कर पाए। अच्छा भैया,प्रणाम। विनीत, मोहन को जाते देख था। मन में सम्मान के भाव आते जा रहे थे
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