क्या होता है ईकबालिया बयान!

संजय दुबे

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क्या एक व्यक्ति चाहे वह पत्रकार क्यों न हो, सर्वज्ञ होता है? नहीं, लेकिन ज्यादा ज्ञानी बताने के फेर में नासमझी सामने आ जाती है। राजा रघुवंशी हत्याकांड में दो आरोपियों ने न्यायधीश के समक्ष "इकबालिया बयान" देने से इंकार कर दिया और स्वयं को निर्दोष बताया।

वे ये भी कहेंगे कि पुलिस ने दबाव डाला, मारपीट की इस भय से अपराध स्वीकार कर लिया। 99.99 प्रतिशत अपराध में आरोपी न तो इकबालिया बयान देता है और न हीं अपराध स्वीकार करता है। इस बात को अधिवक्ता भी आरोपी को समझाते है।

स्वाभाविक सी बात है कि यदि आरोपी, अपराध स्वीकार कर ले तो न्यायधीश को सजा देकर मामले को खत्म करने की आज़ादी मिल जाती है। आखिर इकबालिया बयान क्या होता है? उर्दू में इकबाल का अर्थ होता है स्वीकृति, इकबालिया का अर्थ होता है मन से स्वीकार करना।भारतीय न्याय संहिता में इकबालिया बयान का प्रावधान है, जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज किया जाता है।

यह बयान आरोपी द्वारा मजिस्ट्रेट के सामने दिया जाता है और यह साबित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि आरोपी ने अपराध कबूल किया है। इकबालिया बयान न्यायधीश के सामने दर्ज किया जाता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि यह बयान स्वेच्छा से दिया गया है और किसी भी दबाव या जबरदस्ती के बिना है दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 इकबालिया बयानों को दर्ज करने की प्रक्रिया और मजिस्ट्रेट की भूमिका को निर्धारित करती है। इकबालिया बयान एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है जिसका उपयोग अदालत में आरोपी के खिलाफ किया जा सकता है।

हालांकि, अदालत को यह सुनिश्चित करना होता है कि बयान स्वेच्छा से दिया गया है और इसमें कोई जबरदस्ती या दबाव नहीं था। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि झूठे इकबालिया बयान भी दिए जा सकते हैं।इसलिए, अदालत को इकबालिया बयानों की विश्वसनीयता और निष्पक्षता की सावधानीपूर्वक जांच करनी होती है। इकबालिया बयान मजिस्ट्रेट के सामने या अदालत में दिए जा सकते हैं। इसके अलावा, आरोपी किसी निजी व्यक्ति के सामने भी इकबालिया बयान दे सकता है, जिसे अतिरिक्त-न्यायिक इकबालिया बयान कहा जाता है। यह बयान भी साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य हो सकता है, यदि यह साबित हो जाता है कि यह स्वेच्छा से दिया गया था। साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के अनुसार, अभियुक्त के इकबालिया बयान का केवल वह हिस्सा स्वीकार्य है, जो पुलिस हिरासत में रहते हुए सीधे तथ्यों की खोज की ओर ले जाता है।

अधिकांश अपराध के निर्णय के लिए केवल बयान हीं नहीं परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी महत्वपूर्ण होते है क्योंकि चहमदीद गवाह के सामने अपराध होते कहां है


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