"अ" राज "ठा" "करे"
संजय दुबे
महाराष्ट्र की राजनीति में सही मायने में मराठी मानुष राजनीति की शुरुआत बाला साहेब ठाकरे ने की थी। शिव सेना, उनकी महत्वाकांक्षी संस्था थी,जिसके दम पर उन्होंने मुंबई में उन मुसलमानों के राज का खात्मा कर दिया था जिनकी सोच में धार्मिक कट्टरता और देशद्रोह की भावना थी।
बाला साहब ठाकरे सही मायने में उग्र हिंदुत्व के कर्ता धर्ता थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से ये ऐलान किया था कि बावरी मस्जिद उनके ही कार्यकर्ताओं ने ढाया था। महाराष्ट्र, देश का ऐसा राज्य है जो किसी राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र कहलाता है।
देश की आर्थिक राजनीति के रूप में बांबे, बंबई और अब मुंबई की स्वीकार्यता है।टाटा, अम्बानी, गोदरेज जैसे सम्पन्न घराने के अलावा शेयर बाजार का होना मुंबई को विशिष्ट बनाता है। इससे परे बॉलीवुड का होना वो आकर्षण है जो देश के हिंदी भाषियों को स्वप्न लोक में ले जाकर काल्पनिक दुनियां में घुमाता फिराता है।
एक जमाने में घर से भागने वाला मुंबई की ही राह पकड़ता था। यही कारण है कि आज मुंबई में बिहार, उत्तर प्रदेश सहित कर्नाटक के बहुतायत लोग मुंबई मे जीवन जीने के लिए रोजगार और व्यवसाय कर रहे है। बाला साहब ठाकरे को कभी लगा था कि मुंबई में गैर मराठी भाषियों का स्थानीय रोजगार और व्यवसाय में कब्जा हो रहा है।इसके विरोध के लिए कम व्यवसायिक लाभ के लिए "मराठी मानुष" भावना को हवा दे दी।
इसका फायदा आम मराठी मानुष को मिला या न मिला ये तो मुंबई का मराठी मानुष जाने लेकिन मुंबई में शिव सेना आर्थिक रूप से संपन्न हो गई।राजनीति के बिसात पर बाला साहब ठाकरे वो शख्सियत बन गए जहां कांग्रेस के सुनील दत्त अपने बेटे को बचाने के लिए शरणागत हो गए। बाला साहब ठाकरे इतने सशक्त हो चले थे कि छोरा गंगा किनारे वाला भी बताने लगे कि उनको मराठी बोलना आता है।
बाला साहब ठाकरे के जमाने में उनके उत्तराधिकारी के रूप में उनके पुत्र उद्धव ठाकरे की जगह भतीजे राज ठाकरे को देखा जा रहा था। राज ठाकरे "आग" थे जिनसे महाराष्ट्र की सत्ता कांपती थी लेकिन राजनीति में धृतराष्ट्र की अपनी सुरक्षित जगह है। धृतराष्ट्र, चोला बदल कर ज्यादातर राजनैतिक दलों के प्रमुखों के शरीर में प्रवेश कर सुयोधन खोज लेते है।
बाला साहब ठाकरे को भी ऐसा करना। पड़ा। उद्धव प्रमुख बने और राज ठाकरे को वनवास मिल गया। दो दशक से मुंबई में जमीन तलाशते तलाशते राज ठाकरे कही के नहीं रह गए। सत्ता में सहभागिता लगभग शून्य की ही तरफ था। मराठी भाषा सम्मान को लेकर बीस साल बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे, एक मंच पर आए।टेढ़े बोल बोले,मराठी बोलने बोलवाने के नाम पर खूब तमाशा किया।खुले आम मारपीट करने और वीडियो न बनाने की सलाह भी दे दी।
इस प्रकार के आव्हान से एक बात स्पष्ट है कि। मुंबई में रहने वाले अमिताभ,आमिर,कीर्ति सेनन, हुमा शेख,वरुण धवन,फातिमा शेख, कार्तिक आर्यन,सोहा अली, शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण को अंग्रेजी की जगह मराठी बोलना पड़ेगा, नहीं बोल पाए तो मुंबई के शिव सेना मराठी मानुष कार्यकर्ता इन्हें भी पीटेंगे लेकिन वीडियो नहीं बनाएंगे। अच्छी बात है।ठाकरे बंधु की सोच में संकीर्णता है।
वे मुंबई से बाहर कुछ क्षेत्र को छोड़कर अपनी अस्मिता खो बैठे है।वे ये भी भूल बैठे है कि अगर महाराष्ट्र में गैर मराठी भाषी के साथ अन्याय होगा तो इसका शेष भारत में मराठी भाषियों को किस प्रकार का अनचाहा प्रतिरोध झेलना पड़ेगा?
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