युधिष्ठिर का कुत्ता और न्याय

संजय दुबे

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हमारे देश में ईश्वरीय विधि विधान तर्क संगत है। धर्म में न्याय है।इसी कारण युधिष्ठिर स्वर्ग द्वार पर सशरीर पहुंचे तो उनके पीछे पीछे एक कुत्ता भी साथ साथ पहुंचा था। यमराज ने युधिष्ठिर को अकेले आने के लिए कहा लेकिन युधिष्ठिर अड़ गए। उन्होंने कुत्ते को भी प्रवेश देने की मांग की।

यमराज, युधिष्ठिर से प्रसन्न हो गए। मनुष्य के समकक्ष पशु को बराबरी देने का ये धर्म संदेश आजतक पशु के साथ संवेदनशील होने की मांग करता है। हजारों साल बीत गए। कुत्तों का दो वर्ग में विभाजन हो गया। एक पालतू और दूसरा फालतू, याने आवारा पशु, अंग्रेजी में इन्हें street dog कहा जाता है हिंदी में गली सड़क के कुत्ते। महानगरों में पालतू कुत्तों के लिए तथाकथित लाइसेंस प्रणाली है। फालतू कुत्तों के लिए मादा कुत्तों के लिए नसबंदी जैसी अव्यवस्थित प्रणाली सभी नगरीय निकायों में है।

नींद से उठकर अचानक ही नगरीय निकायों के कर्मचारी सड़क पर अवतरित होते है। मादा कुत्तों को पकड़ते है नसबंदी कर वापस छोड़ देते है। इससे परे एक बड़ी समस्या है।सड़क के कुत्तों के काटने की,जिसको लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने देश की राजधानी के एनसीआर इलाके को तीन सप्ताह के भीतर सड़कों को कुत्ता मुक्त करने का आदेश दिया है। इस मामले को लेकर पक्ष विपक्ष में तर्क आ रहे है। ज्यादातर सहमति इस बात की है कि अकस्मात किसी कुत्ते के आक्रामक होकर किसी व्यक्ति, खासकर बच्चों को काटने से जो भय मन में बैठता है वह अस्वीकार्य है। गंतव्य को जाते दो पहियाँ वाहन चालक को दौड़ाने, काटने के प्रयास के चलते जाती जान और, रेबीज के कारण होती मौत से इस बात पर चर्चा हो रही है कि सड़कों पर कुत्ते क्यों रहे? देश में लगभग डेढ़ करोड़ कुत्ते है इनमें से आठ लाख कुत्ते देश की राजधानी में है। जनवरी से लेकर जून 2025तक 65हजार मादा कुत्तों की नसबंदी की गई है।

इस अवधि में 68090 व्यक्तियों को दिल्ली में कुत्तों ने काटा है। रेबीज के चलते मौत भी हुई है जिनकी संख्या कम है। इस देश में पशु प्रेमी लोग भी है जो पशुओं के प्रति सजग रहते है। मूक पशु के प्रति आवाज उठाते है। इनमें मेनका गांधी सबसे बड़ी पैरवीकार है। एक जमाने में कुत्तों को जहर देकर मार दिया जाता था।अब ये प्रथा पशु संरक्षण अधिनियम के चलते बंद हो चुकी है। पशु के विरुद्ध क्रूरता किए जाने पर आवाज उठती है। इससे परे जो प्रश्न उठता है कि सड़कों पर आतंक फैलाते हुए समूह में दौड़ते या पैदल या दो पहियां वाहन चालकों को अचानक दौड़ाने या काटने वाले कुत्तों की समस्या का स्थाई निराकरण क्या हो? क्या हर नगरीय निकायों में ऐसा शरण स्थली होना चाहिए जहां ऐसे आवारा कुत्तों को रखा जाए, उनके भोजन की व्यवस्था किया जाए।

सड़कों पर घूमते कुत्तों की धार्मिक और मानवीय कारणों से रोटी, ब्रेड, बिस्किट देने वाले लाखों करोड़ो लोग है। इनकी दिक्कत ये है कि इनके घर में फालतू कुत्ते के पालतू होने पर आपत्ति है। जो भी हो कुत्तों की समस्या गंभीर है,खतरनाक है,।जिस पर गुजरी होती है वह इंजेक्शन लगने के बाद भी भय और संशय में जीता है। अनुसंधान और आविष्कार ने रेबीज इंजेक्शन की संख्या 14 से घटा कर 3 कर दिया है। जब 14इंजेक्शन लगा करते थे तो पेट में लगता था। इंजेक्शन का भय के चलते अनेक बार जानकारी नहीं होने पर रेबीज के असरकारक होने पर अत्यंत ही कष्टप्रद मौत होती है। सर्वोच्च न्यायालय की मंशा गलत नहीं है। जो लोग विरोध कर रहे है वे स्ट्रीट डॉग को घर के बाहर खिलाने पिलाने में विश्वास करते है,। कुत्तों के घायल होने पर मानवीय आधार पर उपचार भी कराते है।उनसे एक प्रश्न क्या वे घर में स्ट्रीट डॉग को शरण दे सकते है?


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