विवाह का अर्थ स्वतंत्रता नहीं, आपसी सहयोग और साथ : सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाह के रिश्ते में पति या पत्नी यह नहीं कह सकते कि वे पूरी तरह स्वतंत्र होकर जीना चाहते हैं। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि शादी का अर्थ दो आत्माओं और दो व्यक्तियों का मिलन है।

यदि कोई व्यक्ति पूर्ण स्वतंत्रता चाहता है तो उसे विवाह नहीं करना चाहिए। अदालत एक दंपत्ति के विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी, जिनके दो नाबालिग बच्चे भी हैं। बेंच ने कहा कि विवाह में पति-पत्नी का एक-दूसरे पर भावनात्मक और सामाजिक रूप से निर्भर रहना स्वाभाविक है।

कोई भी जीवनसाथी यह नहीं कह सकता कि वह साथी पर निर्भर नहीं होना चाहता। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि छोटे बच्चों को टूटे परिवार का बोझ क्यों उठाना पड़े।

अदालत ने दंपत्ति से आपसी मतभेद दूर कर बातचीत से समाधान निकालने की अपील की। सुनवाई के दौरान पत्नी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में कहा कि एक हाथ से ताली नहीं बज सकती, जिस पर बेंच ने कहा कि यह संदेश दोनों पक्षों के लिए है।


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