अजीब कुत्तों की गजब कहानी
संजय दुबे
सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश कर दिया है कि शेल्टर होम में कुत्ते रखे नहीं जाएंगे।उनकी नसबंदी कर उन्हें छोड़ दिया जाए।केवल खूंखार सड़कछाप कुत्तों को नहीं छोड़ा जाएगा। इस आदेश से देश भर के कुत्तों को राहत मिली है।
दिक्कत अब सार्वजनिक स्थानों में कुत्तों के प्रति संवेदनशीलता दिखाने वाले उन लोगों की है जो अपने घर के बजाय चौक चौराहों में रोटी, ब्रेड, बिस्किट आदि खिलाते है। स्वच्छता अभियान के चलते शहरी क्षेत्रों में सबसे अधिक दिक्कत में आवारा कुत्ते आए है। इनके खाने के लिए कूड़े करकट में फेका गया खाना अब उपलब्ध नहीं रह गया है।
होटलों, चाय की दुकानों में भी सफाई बढ़ गई है जिसके चलते बचा हुआ नाश्ता खाना सीधे शहर के बाहर चला जाता है। देश भर में जानवरों के प्रति घर के बाहर संवेदनशील लोगों की एक बड़ी बिरादरी है। सुबह के समय इस बिरादरी के लोग मानवीय या धार्मिक कारणों से सड़कछाप कुत्तों को घर में रात की बची रोटी, ताजा ब्रेड, बिस्किट खिलाने मार्निंग वॉक में निकलते है।कुत्ते इस बिरादरी के लोगों को दूर से पहचान लेते है और इकट्ठे हो जाते है। आम लोगों को कुत्तों को रोटी ब्रेड बिस्किट देने वालों से दिक्कत नहीं है।दिक्कत है उन कुत्तों से जो अचानक ही किसी पैदल चलने वाले या दो पहियां वाहन चालकों को भौंकने लगते है या दूर तक दौड़ाते है वह भी समूह में। इसके अलावा मोहल्ले के किसी छोर में रात में कभी भी भौंकते है या आपस में लड़ते है।
इन कारणों से अनेक बार गंभीर दुर्घटना घटी है।इसके अलावा कुत्तों के काटने का डर और भी भयावह है।जो लोग कुत्तों से डरते है उनके भय की सीमा नहीं होती।इस पर से कुत्ते के काटने के बाज रेबीज के इंजेक्शन जिनकी संख्या पहले सात थी अब तीन से लेकर पांच है। इनकी कीमत 1200से 1800रुपया है। सवाल पैसे से ज्यादा परेशानी की है। दो से चार सप्ताह तक सारे इंजेक्शन के कोर्स में लगता है। मानसिक परेशानी अलग। जानवरों के प्रति संवेदनशीलता अच्छी बात है लेकिन ये केवल सार्वजनिक स्थानों में हो ये अनुचित है।
हिंदू धर्म शास्त्र में कुत्ते के लिए एक रोटी बनाने की व्याख्या है। शनि ग्रह से पीड़ित लोगों के लिए कुत्ते को रोटी खिलाना अनिवार्य है,इसके बिना शनि शांत नहीं होगा। प्रश्न ये उठता है सार्वजनिक स्थानों पर संवेदना दिखे,धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति हो लेकिन जो लोग रोजाना भयपूर्वक आते जाते है, कुत्तों के आतंक का शिकार होते है ऐसे लोगों के लिए कहां राहत मिलेगी? शहर या ग्रामीण निकायों को कुत्तों से निजात दिलाने की जिम्मेदारी है।इन संस्थाओं के पास कोई नियोजित कार्यक्रम और बजट नहीं है।
आज की तारीख में एक कुत्ते को पकड़ कर नसबंदी कराकर वापस कराने में डेढ़ हजार रुपए खर्च होते है। किसी भी नगरीय निकायों में इसका अभाव है।ऐसे में न्यायालय के निर्णय का असर कुत्तों के नियंत्रण में कितना होगा, प्रश्न तो है
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