सवाल भाषाई नफासत का है
संजय दुबे
"ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोए,औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होय" -कबीर दास की ये पंक्तियां एक हजार साल पहले लिखी पंक्तियां है जो हर काल में होने वाले व्यक्तियों के लिए सार्थक है।
आज के दौर में विशेष रूप से जिस प्रकार के घिन उत्पन्न करने वाले शब्दों का चयन हो रहा है जिस प्रकार की भाषा सार्वजनिक रूप से जिम्मेदार व्यक्तियों द्वारा बोली जा रही है,शर्मनाक है। हर स्तर के अविवेकी लोग जो चाहे झोपडी में रह रहे हो या महल में,उनकी भाषा बोली सुनने के बाद घिन आती है कि जिन लोगों को देश ने जिम्मेदारी है वे किस प्रकार की भाषा बोल रहे है?
लोकतांत्रिक देशों के संविधान में अभिव्यक्ति की "नियंत्रित" आजादी सभी को मिली है। इसी संविधान में देश के नेतृत्व के लिए संवैधानिक पदों का सृजन हुआ है। देश का प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण पद है।देश के चुनाव में बहुमत दल के नेता होते है जिनका पदीय और बतौर व्यक्ति आदर करने का भाव पक्ष और विपक्ष के साथ देश के हर व्यक्ति की है। हर व्यक्ति के पद के साथ बड़े छोटे होने का भी उम्र ,अनुभव के आधार पर सम्मान, अपनत्व देने की जिम्मेदारी भी सभी की होती है। पिछले तीन लोकतांत्रिक प्रक्रिया अंतर्गत हुए लोक सभा चुनाव में बहुमत दल के नेता के रूप नरेंद्र मोदी को देश का प्रधान मंत्री चुना गया है।
दो बार के लोकसभा चुनाव में लोकसभा के कुल सीट में से दस फीसदी सीट न पाने के कारण लोकसभा नेता प्रतिपक्ष विहीन रहा।तीसरे लोक सभा चुनाव में कांग्रेस को 18फीसदी लोक सभा सीट मिली और नेता प्रतिपक्ष पद भी मिला। राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष बने। उनके पीछे इंडी गठबंधन के सांसदों की पर्याप्त समर्थन संख्यां भी है।इसे हम मजबूत प्रतिपक्ष की संज्ञा दे सकते है। चुनाव के बाद प्रतिपक्ष या विपक्ष की जिम्मेदारी होती है कि उसके नेता के आचरण मर्यादित हो, भाषा सहज,सरल हो मर्यादित हो।
अटल बिहारी बाजपेई सालों विपक्ष में रहे। विरोध उनके स्वभाव में था लेकिन भाषा ऐसी थी कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरसिंहराव सहित हर सांसद उन्हें आदर देता रहा, सम्मान देता रहा। राहुल गांधी देश के जिम्मेदार पद पर है।उनकी भाषा भी गंभीर होना चाहिए।शब्द चयन में सावधानी बरतना चाहिए। "चोर" जैसा शब्द बोलना, उनके व्यक्तित्व को बौना करता है। चुनाव हो या ना हो लेकिन किसी भी व्यक्ति खासकर जो जिम्मेदार पद पर है उन्हें आलोचनात्मक शब्द का उपयोग करने में बहुत ही अधिक सतर्कता बरतना चाहिए। राहुल गांधी को अनुचित शब्द कहने के कारण न्यायालयीन प्रक्रिया से गुजराना पड़ा है।
उन्हें चेतावनी भी मिली है, नसीहत भी दी गई है,न्यायालय द्वारा फटकार भी लगाई गई है,मानहानि के चलते निचले न्यायालय ने उन्हें दंडित भी किया है। इतने के बाद तो भाषाई सुधार हो जाना चाहिए था। माना जाता है जितना बड़ा वाहन होता है उसे उतनी ही बड़ी सावधानी बरतना होता है।अपशब्द तो जाहिल लोग बोलते है उनके समकक्ष होना खुद को छोटा करना होता है।
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