द्रोण,क्यों स्वीकार्य गुरु नहीं माने गए!
संजय दुबे
आज शिक्षक दिवस है,शिक्षक को गुरु भी माना जाता है। आदिकाल में गुरुकुल हुआ करते थे। यहां गुरु - शिष्य परंपरा ने जन्म लिया। ऋषि परम्परा में देश में एक से एक गुरु हुए जिन्होंने ईश्वर को भी मानव रूप में शिक्षा दी। महर्षि वाशिष्ठ ने राम और संदापनी ने कृष्ण को शिक्षित किया।ईश्वर को छोड़कर इंसानों पर आए और कृष्ण के महाभारत काल में प्रवेश करे तो गुरु द्रोण का नाम आता है।
भारद्वाज ऋषि के पुत्र द्रोणाचार्य को न तो एक अच्छा योद्धा माना गया, न ही पिता माना गया ओर न ही गुरु। योद्धा वे इसलिए अच्छे थे कि उनको महर्षि परशुराम के अस्त्र शस्त्र दक्षिणा में मिले थे।इन्हें चलाने का ज्ञान भी मिला था। इनमें प्रमुख अस्त्र ब्रह्मास्त्र था। द्रोण को सेना में व्यूह विन्यास के लिए माना जाता है। द्रोण 11,12,13और 14वे दिन कौरव सेना के सेनापति रहे।
अपने जीवन काल में द्रोण ने जो गलतियां की उसके चलते वे सभी जिम्मेदार पदों में उत्कृष्ट नहीं माने गए। उनके गुरुकुल के साथी द्रोपदी के पिता द्रुपद रहे जिन्होंने बाल काल में अपना आधा राज्य देने की बात कही।इसे द्रोण ने यथार्थ मान लिया। जीवन के दरिद्र काल में अपने पुत्र अश्वत्थामा को गरीबी के बजाय अमीर बनाने के लिए उन्होंने द्रुपद से आधा राज्य मांगा। नहीं मिलने पर कौरव पांडु पुत्रों से गुरु दक्षिणा में द्रुपद को बंदी बनाकर लाने की मांग की। गुरु, कभी भी शिष्यों से दक्षिणा नहीं मांगते, ये जरूर है कि शिष्य या उसके अभिभावक दक्षिणा जरूर देते है।द्रोण ने परंपरा का उल्लंघन किया।
द्रुपद को बंदी बनाने के बाद आधा राज्य लेकर अपने पुत्र अश्वत्थामा को राजा बना दिया। कौरव पांडु पुत्रों को अस्त्र शस्त्र की शिक्षा दी लेकिन धर्म अधर्म का पाठ नहीं पढ़ाया। उनके गुरुकुल में कौरव पुत्र षड्यंत्र करते रहे लेकिन द्रोण इसे रोक नहीं सके। एकलव्य के उसके दाहिने हाथ का अंगूठा, गुरु दक्षिणा में मांगना, गुरु के बजाय याचक का कृत्य माना गया। कृष्ण ने महाभारत युद्ध के लिए जिन तीन लोगों का जिम्मेदार माना है.
उनमें भीष्म, द्रोण और कर्ण ही थे। द्रोण, ने भीष्म की तरह द्रोपदी के चीर हरण में मुक्का बना रहना पसंद किया। युद्ध हुआ तो अभिमन्यु की हत्या का दोष उनके सिर मढ़ा। पुत्र अश्वत्थामा को राजसुख देने के लिए एक गुरु का समझौता उनके कद को बौना कर दिया। कृष्ण ने उन्हें इन सारी बातों को मृत्यु पूर्व बताया जिसके चलते द्रोण ने मृत्यु को स्वीकार भी किया।
आज के दौर में गुरु को कैसा होना चाहिए ये गुरुओं को तय करना है। गुरु शिष्य के बीच सम्मान और स्नेह का संबंध होता है।इसमें निश्चित रूप से गिरावट आई है। बहुतेरे गुरुओं ने सीमाएं लांघी है और खुद को द्रोण बनाया है।
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