भूपेन दा हजारिका

संजय दुबे

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भारत के संविधान में जिन 22 भाषाओं को मान्यता है उनमें पहली भाषा असमिया है। असम,को पूर्वोत्तर राज्यों का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। ब्रह्मपुत्र नदी के साथ साथ कामख्या के मंदिर, काजीरंगा अभ्यारण असम की पहचान है।

ये वही असम राज्य है जहां तीस साल से कम उम्र के मुख्यमंत्री प्रफुल्ल मोहंतो और गृह मंत्री भृगु फूंकन भी1985 में बने। इसी राज्य को ब्रह्मपुत्र नदी के समान एक स्वर लहरी बिखरने वाले एक गीतकार, गायक, लेखक और निर्देशक के लिए भी जाना जाता है - भूपेन हजारिका के लिए।

भूपेन हजारिका ने असमिया भाषा को इतनी ऊंचाई दी जितना सत्यजीत रे ने बंगाली फिल्मों को दिया। बिस्मिल्लाह खान में शहनाई को दिया और भीमसेन जोशी ने क्लासिकल गायन को दिया। यही कारण भी रहा कि भूपेन हजारिका इनके समकक्ष पद्म श्री पद्म भूषण, पद्म विभूषण और भारत रत्न याने सभी नागरिक अलंकरण पुरस्कार से सम्मानित हुए।

भारत के इतिहास में भूपेन हजारिका ऐसे व्यक्तित्व है जिन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण(2012) भारत रत्न (2019)में मिला। फिल्म के क्षेत्र में अतुलनीय सेवा के लिए 1992 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला। ये उपलब्धि भूपेन हजारिका के अलावा केवल सत्यजीत रे को भी मिला है। इन पुरस्कारों से अंदाज लगाया जा सकता है कि "रूदाली"फिल्म में दिल हुम हुम करे और समय ओ धीरे चलो गाने वाले भूपेन दा कितने बड़े व्यक्तित्व थे।

एक तरफ भारत देश में हिंदी फिल्मों के चलते हिंदी गीतों का वर्चस्व इतना है कि दीगर भाषाएं, अपने अपने क्षेत्र में सिमट के रह जाती है। असमिया भाषा को भूपेन हजारिका ने राज्य की सीमा से परे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया। इस काम में भूपेन हजारिका को 48साल(1948-2006)लग गए।39 असमिया फिल्मों में गायन,18 में संगीत, 14 में निर्देशन, और "एक पल" फिल्म में लेखन और अभिनय तक भूपेन हजारिका विस्तार लिए हुए थे असमिया भाषा में लोरी और पारंपरिक गीतों की बड़ी महत्ता है।

भूपेन हजारिका को उनकी मां शांतिप्रिय हजारिका ने बचपन में ही पारंगत कर दिया था।इस बुनियाद पर भूपेन हजारिका इतने विशाल हो गए कि देश के अन्य भाषाओं के बड़े बड़े हस्ताक्षर छू नहीं पाए। आज भूपेन हजारिका होते तो 99साल के होते,,, 100 वां साल लगा होता। बताते चले कि भूपेन हजारिका का बचपन का नाम बोर मोइना था।


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