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सामर्थ्य की पहचान ही विजय है
जब स्वाभिमान अनिवार्य हो तो युद्ध भी अनिवार्य होता है। ये बात बेमानी है कि शत्रु कितना ताकतवर है। अपने सामर्थ्य की परीक्षा लेना भी अनिवार्य है। एक कहानी प्रासंगिक है बरोदा गांव में विषधर सांप हुआ करता था।
उसके दंश डर से कोई उस क्षेत्र में नहीं जाते थे। उस गांव में एक साधु आए।सभी ने विषधर सांप के बारे में बताया।अपने डर को भी जाहिर किया। साधु, विषधर के निकट गए,विषधर को समझाया कि बेवजह काटना धर्म विरुद्ध है, विषधर को समझ में आ गया।
विषधर ने आश्वाशन दिया कि भविष्य में नहीं काटेगा।साधु ने ये बात गांव वालों को बता दिया कई महीने बाद साधु वापस बरोदा गांव आए। विषधर से मिलने गए।देखा विषधर लहू लुहान पड़ा है। विषधर ने अपनी इस स्थिति के लिए अहिंसात्मक होने की वजह बताई।
साधु ने कहा "विषधर मैने आपके सामर्थ्य को खत्म करने के लिए नहीं कहा था।आपके काटने का उपक्रम (फूंफंकारना) ही सामने वाले के लिए पर्याप्त है। विषधर ने स्वीकार कर अपने सामर्थ्य को स्वीकार कर कर्म प्रारंभ किया।
गांव वाले विषधर से आज भी डरते है विजय दशमी की बधाई अपने सामर्थ्य की पहचान ही, आपके विजय दशमी की शुभ कामनाएं है
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