भारतीय हॉकी के सौ साल
संजय दुबे
1928से लेकर 1956 तक और 1964 सहित 1980 में ओलम्पिक हॉकी के गोल्ड मेडल विजेता भारतीय हॉकी के सौ साल पूरे हो गए। अंतरास्ट्रीय हॉकी संघ के 1924 में स्थापना के एक साल बाद ग्वालियर में 7 नवंबर1925 को भारतीय हॉकी संघ की बुनियाद रखी गई थी।
महज तीन साल बाद भारतीय हॉकी टीम 1928 के ओलम्पिक खेलों में भाग लेने गई और गोल्ड मेडल लेकर वापस आई। भारत में इस दौर के पहले 1850 में बेटन कप हॉकी स्पर्धा कोलकाता में आयोजित होती थी। मुंबई में आगा खान कप भी बड़ी स्पर्धा थी। वक्त का पहिया चलते जा रहा था। 1947 में भारत का विभाजन हुआ ।
पाकिस्तान का जन्म हुआ। इस विभाजन का असर भारतीय हॉकी पर पड़ा और ओलम्पिक हॉकी में एकाधिकार टूटने लगा। प्राकृतिक हॉकी का मैदान बदला और एस्ट्रो टर्फ आने से क्लासिकल हॉकी की जगह पावर प्ले आ गया। इस बदलाव का प्रभाव भारतीय हॉकी पर सबसे ज्यादा पड़ा। 1975 में भले ही भारत विश्व विजेता बना लेकिन इसके बाद दिन ब दिन हॉकी की टीम वेस्ट इंडीज की क्रिकेट टीम के समान होते गई।1980के बाद ओलम्पिक खेलो में 2020और 2024 में ब्रॉन्ज मेडल भले मिला है लेकिन हॉकी के सुपर पावर में पश्चिमी देशों का दबदबा बना हुआ है।
एक दौर था जब सत्तर मिनट के इस खेल के लिए घर घर कमेंट्री सुनी जाती थी।भारत। पाकिस्तान के मैच धड़कन बढ़ाने वाले होते थे। कपिलदेव के 1983 में विश्व कप विजेता होने के बाद देश को आबो हवा बदल गई। राष्ट्रीय खेल हॉकी से क्रिकेट में शिफ्ट हो गया। ऐसे दौर में भारतीय हॉकी के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव आया। 2009 में भारतीय पुरुष और महिला हॉकी संघ का विलय हो गया। अब हॉकी इंडिया ये काम देख रही है।
आज भारतीय हॉकी की पुरुष और महिला टीम बेहतर खेल का प्रदर्शन कर रही है।2020 में महिला टीम ओलम्पिक खेलो में चौथे स्थान पर रही। इसका श्रेय उड़ीसा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को जाता है उन्होंने वित्तीय रूप से हॉकी को बहुत सहारा दिया। प्रशिक्षण के लिए सारी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई। हॉकी का नाम आते ही मेजर ध्यानचंद अपने आप ही प्रकट हो जाते है। सर्वाधिक 570 मैच खेलने वाले ओलंपिक खेलों के बारह मैच में 37 गोल करने वाले ध्यानचंद हॉकी के जादूगर माने जाते है।
उनसे ज्यादा चार ओलम्पिक खेलो में लेस्ली क्लॉडियस और उधम सिंह ने खेले लेकिन गोल संख्या में ध्यानचंद आगे ही है। सौ साल के इतिहास को देखे तो हॉकी ने देश को अंतरास्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया है। बदलाव के दौर में सत्तर मिनट का खेल साठ मिनट का हो गया है।
मैदान कृत्रिम घास के हो गए। एक इंटरवल के बजाय तीन इंटरवल आ गए। क्लासिकल हॉकी के जगह पावर प्ले आ गया है। इससे जुड़ते जुड़ते भारतीय हॉकी टीम पदक तालिका में वापस। आ गई है। अब ये उम्मीद बनती है कि देश का स्वर्णिम हॉकी का दौर वापस आएगा
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