नासा के अनुसार, उत्तर भारत में मौसमी फसल अवशेष (पराली) जलाने की घटनाएं अब दिन के पहले की तुलना में देर से शुरू हो रही हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बदलाव से पराली जलाने की निगरानी और वायु गुणवत्ता पर इसके प्रभाव का आकलन करना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

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नासा के अनुसार, उत्तर भारत में मौसमी फसल अवशेष (पराली) जलाने की घटनाएं अब दिन के पहले की तुलना में देर से शुरू हो रही हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बदलाव से पराली जलाने की निगरानी और वायु गुणवत्ता पर इसके प्रभाव का आकलन करना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

यह निष्कर्ष उपग्रह अवलोकनों और हालिया अध्ययनों पर आधारित है। दशकों से, धान की कटाई के बाद अक्टूबर से दिसंबर के बीच इंडो-गंगेटिक मैदान में पराली जलाने के कारण धुएं और धुंध की लंबी परतें फैलती रही हैं।

नासा की विज्ञप्ति के मुताबिक, वर्ष 2025 में पराली जलाने के मौसम का कुल पैटर्न तो अपेक्षाओं के अनुरूप रहा, लेकिन आग लगाने के दैनिक समय में पहले के रुझानों से स्पष्ट बदलाव देखने को मिला है।


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