संविधान स्मारक नहीं, जीवंत खाका है : CJI सूर्यकांत

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देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने को युवा वकीलों से कहा कि वे खुद को केवल ‘मामलों के निर्माता’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘राष्ट्र निर्माता’ के रूप में देखें और खुद से यह बड़ा, अधिक स्थायी प्रश्न पूछें कि भारत जैसे देश में एक वकील की भूमिका क्या है।

पंजाब के पटियाला में राजीव गांधी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के सातवें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए CJI ने कहा कि प्रत्येक पीढ़ी देश को अपूर्ण रूप में विरासत में पाती है और इसके भविष्य को आकार देने की जिम्मेदारी वहन करती है। उन्होंने इस मौके पर छात्रों को ‘मामला निर्माता’ और ‘राष्ट्र निर्माता’ के बीच अंतर भी स्पष्ट किया।

CJI सूर्यकांत ने छात्रों से कहा, ‘‘आप सभी को दुनिया में अपना स्थान ग्रहण करते हुए देखकर मुझे एक सरल सत्य याद आता है - प्रत्येक पीढ़ी को गणतंत्र अपूर्ण अवस्था में प्राप्त होता है। हमारा संविधान पत्थर पर उकेरा गया महज स्मारक नहीं है, बल्कि एक विलक्षण खाका है। न्यायालय इसकी व्याख्या करते हैं, संस्थाएँ इसे संरचना प्रदान करती हैं, लेकिन आप, मेरे प्रिय युवाओ, इसे जीवन प्रदान करेंगे। आपको यह तय करना होगा कि भारत आगे क्या बनेगा।

 प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि जब भी उन्हें इतने युवा और ऊर्जावान श्रोताओं को संबोधित करने का सौभाग्य मिलता है, ‘‘मुझे यह स्वीकार करना होगा कि मैं मानता हूं कि आप में से अधिकतर लोग वकील बनेंगे।

 न्यायमूर्ति कांत ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब कई छात्रों ने कानून का अध्ययन करने का विकल्प चुना, तो उन्होंने शायद खुद को ऐतिहासिक मामलों में बहस करते हुए, जटिल अनुबंधों का मसौदा तैयार करते हुए या शायद, एक दिन संवैधानिक पीठों को संबोधित करते हुए कल्पना की होगी, जो कि सराहनीय महत्वाकांक्षाएं हैं और उनमें कुछ भी गलत नहीं है।


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