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राष्ट्रीय मीडिया की बहसों पर रायपुर साहित्य उत्सव में मंथन
रायपुर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन लाला जगदलपुरी मंडप में आयोजित परिचर्चा ‘राष्ट्रीय मीडिया में बहस के मुद्दे’ ने मीडिया की मौजूदा दिशा, चुनौतियों और संभावनाओं पर गंभीर विमर्श को मंच दिया। सूत्रधार श्री वरुण सखा के सवालों के जवाबों के रूप में वरिष्ठ पत्रकारों और मीडिया विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय मीडिया की भूमिका, उसकी प्राथमिकताओं और भविष्य की जरूरतों पर खुलकर बात रखी।
यह सत्र छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय श्री रमेश नैयर को समर्पित था। परिचर्चा में वरिष्ठ पत्रकार श्री अनिल पाण्डेय ने कहा कि राजनीति का मीडिया के केंद्र में आना एक सकारात्मक संकेत है। पिछले एक दशक में खबरों के ट्रेंड में बड़ा बदलाव आया है, जहां कभी बॉलीवुड और सिनेमा की खबरें हावी रहती थीं, वहीं अब राजनीति प्रमुख विषय बन रही है। उन्होंने सरकार से प्रेस आयोग या मीडिया आयोग के गठन की मांग करते हुए कहा कि समय के अनुरूप नीतियां और नियमन बनेंगे तो पत्रकारों के हितों की रक्षा संभव होगी। ट्रेड यूनियनों, पत्रकार संगठनों, मीडिया मालिकों और संपादकों के साथ संवाद से मीडिया का माहौल बेहतर हो सकता है। उन्होंने कहा कि आज टीवी चैनलों के प्राइम टाइम डिबेट के विषय सोशल मीडिया तय कर रहा है।
उन्होंने पत्रकारों के संवेदनशील और अध्ययनशील होने के साथ ही मुद्दों को समझने के लिए उनके समुचित प्रशिक्षण पर भी जोर दिया। वरिष्ठ पत्रकार श्री अखिलेश शर्मा ने छत्तीसगढ़ के संदर्भ में राष्ट्रीय मीडिया की भूमिका पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद से जुड़ी घटनाओं को तो राष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता मिलती है, लेकिन नक्सल मोर्चे पर हो रहे सकारात्मक बदलावों और विकास कार्यों को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाता। उन्होंने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश बताते हुए कहा कि लोकतंत्र में कमियां हो सकती हैं, लेकिन हर पांच साल में सरकार बदलने की प्रक्रिया इसे मजबूत बनाती है।
एक पत्रकार के रूप में लोकतंत्र को पंचायत से लेकर संसद तक मजबूत करना मीडिया की जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया को केवल टीवी तक सीमित नहीं मानना चाहिए, अखबार और पत्र-पत्रिकाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। वरिष्ठ पत्रकार श्री उमेश चतुर्वेदी ने मीडिया की व्यावहारिक चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि सूचना का सबसे बड़ा प्रदाता सरकार ही है और लगातार छुट्टियां पड़ने पर अखबार निकालना तक मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा कि मीडिया संस्थानों में जमीनी रिपोर्टिंग कम हो रही है, क्योंकि यह खर्चीली है, जबकि प्रायोजित खबरें और डिबेट कम खर्च में आसान विकल्प बन गए हैं।
उन्होंने चिंता जताई कि मीडिया संस्थान असल पत्रकारिता, अभिव्यक्ति और भाषा कौशल से भटक रहे हैं, जिससे अनावश्यक शब्दावली और आरोप-प्रत्यारोप बढ़ रहे हैं। परिचर्चा में यह भी कहा गया कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पत्रकारिता की पढ़ाई तो हो रही है, लेकिन व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी है। पत्रकारिता अब खबर और समाज से जुड़ी जिम्मेदारी के बजाय कंटेंट जेनरेशन तक सिमटती जा रही है, जो भविष्य के लिए चिंता का विषय है।
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