छात्र आंदोलन, कांग्रेस और ‘अलग मंच’ का मिथक: आखिर तथ्य क्या कहते हैं?

डॉ चयनिका उनियाल एसोसिएट प्रोफेसर दिल्ली विश्वविद्यालय

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हाल ही में एक चर्चा के दौरान किसी ने मुझसे कहा कि “राहुल गांधी ने अपनी अलग दुकान लगाकर ठीक नहीं किया।” यह टिप्पणी केवल राजनीतिक मतभेद नहीं थी, बल्कि घटनाक्रम की एक ऐसी व्याख्या थी, जिससे मैं सहमत नहीं थी।

मेरा उत्तर सीधा था—पहली बात, इसे “दुकान” कहना ही अनुचित है। दूसरी बात, यदि आपकी भाषा में इसे “दुकान” मान भी लिया जाए, तो अलग मंच कांग्रेस ने नहीं, बल्कि CJP ने बनाया था। कांग्रेस का आंदोलन पहले से चल रहा था

यह समझना आवश्यक है कि कांग्रेस अचानक इस आंदोलन में नहीं आई। जून माह से ही कांग्रेस के नेतृत्व में “छात्रों की गूंज” नाम से युवाओं और प्रतियोगी छात्रों का राष्ट्रव्यापी जनसंवाद एवं विरोध अभियान चल रहा है।

यह अभियान तीन स्पष्ट मांगों पर आधारित है—

* शिक्षा मंत्री का इस्तीफा – पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली की लगातार विफलताओं की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए।
* पारदर्शी एवं पेपर लीक-मुक्त परीक्षा व्यवस्था – ताकि युवाओं का भविष्य सुरक्षित रहे।
* समयबद्ध वार्षिक भर्ती कैलेंडर – जिससे वर्षों तक भर्ती प्रक्रियाएँ लंबित न रहें।

राहुल गांधी सहित कांग्रेस के अनेक नेता लगातार देशभर में छात्रों से मिल रहे थे। कांग्रेस कार्यकर्ता विभिन्न राज्यों में प्रदर्शन, जनसंवाद और समर्थन अभियान चला रहे थे। ऐसे में यह कहना कि राहुल गांधी ने अचानक एक अलग आंदोलन शुरू कर दिया, वस्तुतः तथ्यों से मेल नहीं खाता।

फिर समानांतर मंच किसने बनाया?

मेरी समझ में यदि किसी ने समानांतर मंच खड़ा किया, तो वह CJP था। किसी को समानांतर आंदोलन चलाने से किसने रोका था? लोकतंत्र में हर संगठन को आंदोलन करने का अधिकार है।

लेकिन यदि पहले से चल रहे एक राष्ट्रव्यापी छात्र आंदोलन के समानांतर मंच बनाया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठेगा कि इससे किसका लाभ हुआ और किसका नुकसान।

मुझे व्यक्तिगत रूप से यह संदेह होता है कि इससे ‘छात्रों की गूंज’ अभियान का फोकस कमजोर हुआ। इस संदेह के पीछे कुछ कारण भी हैं।

शुरुआत में ही अभिजीत ने सार्वजनिक रूप से कहा कि विपक्ष कमजोर है और उन्हें राहुल गांधी नहीं चाहिए। बाद में प्रदर्शन के दिन जिस तरह नेतृत्व टीम लगभग नज़र नहीं आई और छात्रों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया, उससे भी कई सवाल खड़े हुए। यह मेरा विश्लेषण है; अन्य लोग इससे अलग निष्कर्ष निकाल सकते हैं।

क्या राहुल गांधी को अलग मंच लगा लेना चाहिए था?

चर्चा में एक और तर्क आया—

“आंदोलनों के फैसले बदलती परिस्थितियों के अनुसार लिए जाते हैं। यदि राहुल गांधी AISA की तरह अपना अलग मंच लगाकर जंतर-मंतर पर बैठते, तो आंदोलन और कांग्रेस दोनों को अधिक लाभ होता।”

मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूँ।

राहुल गांधी की तुलना किसी छात्र संगठन से नहीं की जा सकती। वे देश के सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता हैं। उनके पीछे लगभग 100 सांसद, सैकड़ों विधायक और करोड़ों समर्थकों का राजनीतिक आधार है। उनका किसी आंदोलन से जुड़ना केवल एक और मंच बनाना नहीं होता, बल्कि उस मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ले आना होता है।

उन्होंने कोई समानांतर आंदोलन शुरू नहीं किया, बल्कि जून से चल रहे उसी आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूती दी।

असली प्रश्न क्या है?

मेरे लिए प्रश्न यह नहीं है कि कौन किस मंच पर गया।

असली प्रश्न यह है कि—

* क्या छात्रों के मुद्दे राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बने?
* क्या पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर सरकार पर दबाव बढ़ा?
* क्या युवाओं की आवाज़ संसद और देशभर में पहुँची?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर “हाँ” है, तो यह कहना कि राहुल गांधी ने आंदोलन को कमजोर किया, उचित नहीं लगता।

निष्कर्ष

रणनीति पर मतभेद हो सकते हैं और लोकतंत्र में होने भी चाहिए। लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले तथ्यों को देखना आवश्यक है।

कांग्रेस जून से “छात्रों की गूंज” अभियान चला रही थी। राहुल गांधी उसी अभियान को आगे बढ़ाने और छात्रों के संघर्ष को राष्ट्रीय मंच देने पहुँचे थे। यदि कोई अन्य संगठन समानांतर आंदोलन चलाना चाहता था, तो उसे पूरा अधिकार था। लेकिन यह कहना कि राहुल गांधी ने अलग आंदोलन खड़ा किया, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर सही प्रतीत नहीं होता।

आख़िरकार, मुद्दा मंच का नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य का होना चाहिए।

 

अस्वीकरण : इस लेख में दी गई सामग्री, विचार और राय केवल लेखक के अपने हैं। 'बबुआ.कॉम' केवल समाचार प्रसारण के उद्देश्य से इसे प्रकाशित करता है। यह प्लेटफ़ॉर्म लेख की सामग्री, सटीकता या विचारों के लिए किसी भी तरह से अधिकृत या उत्तरदायी नहीं है।"


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