बुरी बात को कहने वाली भली औरत बनाम इस्मत चुगताई "आपा"

संजय दुबे

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हिंदी भाषा में जितनी मिठास है उर्दू भाषा में बराबर की नफासत है।इस कारण दोनों भाषाओं को सगी बहन कहा गया है।मै तो इन्हें जुड़वा बहने मानता हूं। भाषा की तहजीब को समझे तो दोनों गंगा यमुना है। उर्दू लेखन में पुरुषों का लिखना स्वाभाविक माना जा सकता है क्योंकि उनके तालीम के लिए मकतब की सुविधा रही हुई है।

रामायण महाभारत काल में भी गुरुकुल थे लेकिन पुरुषों के लिए। सत्तर अस्सी साल पहले देश में देखे तो महिलाओं के लिए शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी। जिन महिलाओं ने जोखिम मोल लिया वे आगे बढ़ी, विद्रोही भी कहलाई, ऐसी ही एक हस्ताक्षर है- इस्मत आपा, उर्दू लेखन में इस्मत को कहानी उपन्यास लेखन के लिए जाना और माना जाता है।

वे शिक्षा पाने के लिए परिवार से विद्रोह किया। मुस्लिम होने के नाते संप्रदाय में दबी कुचली सहमी महिलाओं के दर्द को देखा, समझा और बेबाक तरीके से सबके सामने लाया। किसी भी समाज का पुरुष, महिलाओं की तरफदारी करने वालो को पसंद नहीं करते।अगर तरफदारी करने वाली महिला हो तो उसे कुलटा कहने या उसके चरित्र पर उंगली उठाने से बाज नहीं आते।

इस्मत आपा के साथ भी ऐसा हुआ। महिलाओं के शोषण और तब के जमाने में मुस्लिम बिरादरी के कुछ पुरुष महिलाओं के शौक को "लिहाफ" उपन्यास में ऐसा पिरोया कि हलचल मच गई। इस्मत आपा भली महिला थी लेकिन उनके लेकिन को बुरा मान लिया गया।

इस्मत झुकने वाली महिला तो थी नहीं, उन्होंने उच्च न्यायालय से लड़ाई जीती। इस जीत ने उनके लेखन को और भी धारदार बना दिया। "टेढ़ी लकीर" उनके खुद के जीवन का ताना बाना माना गया। चोटे ,छुईमुई, एक बात, कलियां, एक रात, शैतान, जड़े, कामचोर कहानी को पढ़े तो लगेगा कि इस्मत आपा आपको उस दुनियां में ले गई है जिसे वे बयां कर रही है। टेढ़ी लकीर, जिद्दी, एक कतरा खून, दिल की दुनियां, जंगली कबूतर, अजीब आदमी, और जिस "लिहाफ" ने उन्हें महिला मंटो बनाया पठनीय उपन्यास है।

अस्मत आपा ने शशि कपूर की फिल्म जुनून के संवाद लिखे।"गर्म हवा" फिल्म की पटकथा भी लिखी ।पुरस्कृत भी हुई। उनके उर्दू लेखन ने उनको साहित्य अकादमी और पद्मश्री जैसे नागरिक अलंकरण पुरस्कार से सम्मानित हुई। इस्मत आपा के लेखन का तीन नमूना देख लीजिए पहला है"जब मोहब्बत नापाक होती है तब ही खूबसूरत मानी जाती है" और दूसरा क्लियोपेट्रा की नाक एक इंच के अठारहवें हिस्से बड़ी होती तो उसका असर वादी ए नील की तारीख पर क्या होता। अंत में लिहाफ का एक अंश" न जाने जिंदगी कहां से शुरू होती है वहां से जब वे पैदा होने की गलती कर चुकी थी या वहां से जब वो नवाब बेगम बन कर आई और छपर खट पर जिंदगी गुजरने लगी या जब से...तब वो मन्नतों, मुरादों से हार गई, चिल्ले बंधे और टोटकों और रातों की वजीफा ख्वानी भी चित्त हो गई।कभी पत्थरों में जोंक लगते है? नवाब साहब अपनी जगह से टस से मस न हुए।

बेगम जान का दिल टूट गया।वो इल्म की तरफ मुतवज्जा हुई लेकिन यहां भी उन्हें कुछ नहीं मिला।" आज इस्मत आपा का जन्म दिन है। अपने विद्रोही स्वभाव के चलते आपा सुपुर्द ए खाक नहीं हुई।अग्निसंस्कार करवा कर गई। सचमुच , इस्मत चुगताई "बड़ी आपा" है


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