कर्नाटक सरकार के ‘हेट स्पीच’ बिल पर केंद्र ने जताई आपत्ति

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केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कर्नाटक सरकार के विवादास्पद 'हेट स्पीच और हेट क्राइम (रोकथाम) बिल, 2025' पर रोक लगा दी है। केंद्र सरकार का मानना है कि नफरती भाषणों (हेट स्पीच) से निपटने के लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) जैसे मौजूदा केंद्रीय कानून पूरी तरह पर्याप्त हैं, इसलिए इस नए राज्य-स्तरीय कानून की कोई आवश्यकता नहीं है। [1, 2]

यह विधेयक तब से कानूनी गतिरोध में फंसा हुआ था जब फरवरी 2026 में कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था और इसे राष्ट्रपति की सहमति के लिए गृह मंत्रालय के पास भेज दिया था। 

केंद्र सरकार और राज्यपाल की मुख्य आपत्तियां

  • मौजूदा कानूनों की पर्याप्तता: केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, देश के आपराधिक ढांचे में हेट स्पीच और सांप्रदायिक वैमनस्य रोकने के कड़े प्रावधान पहले से मौजूद हैं।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन: राज्यपाल और विपक्षी दलों (BJP व JD-S) ने आपत्ति जताई थी कि नफरत रोकने के नाम पर संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाली 'बोलने की आजादी' को खत्म नहीं किया जा सकता।
  • अस्पष्ट परिभाषा: बिल में हेट स्पीच की परिभाषा इतनी व्यापक और धुंधली रखी गई थी कि सामान्य आलोचना, राजनीतिक व्यंग्य या मीम्स को भी अपराध की श्रेणी में डाला जा सकता था।
  • अधिकारों का दुरुपयोग: आलोचकों का मानना था कि इसके तहत राज्य पुलिस को अत्यधिक शक्तियां मिल जातीं, जिससे विपक्ष और मीडिया की आवाज को दबाया जा सकता था। 

कर्नाटक के इस बिल में क्या प्रावधान थे?

दिसंबर 2025 में कर्नाटक विधानसभा द्वारा भारी हंगामे के बीच पारित इस विधेयक में निम्नलिखित कड़े प्रावधान शामिल किए गए थे:

प्रावधान  विवरण
दायरा जीवित या मृत व्यक्ति, किसी वर्ग या समुदाय के खिलाफ बोले गए, लिखे गए या सोशल मीडिया पर शेयर किए गए आपत्तिजनक शब्द।
पहली बार अपराध कम से कम 1 साल और अधिकतम 7 साल तक की जेल और ₹50,000 जुर्माना।
दोबारा अपराध कम से कम 2 साल और अधिकतम 10 साल तक की जेल और ₹1 लाख जुर्माना।
प्रकृति यह एक संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-Bailable) अपराध घोषित किया गया था।
सामग्री हटाना राज्य सरकार के पास इंटरनेट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से ऐसी सामग्री को ब्लॉक करने या हटाने का अधिकार था।

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