आधी आबादी और पूरा जश्न
लेखक- संजय दुबे
8मार्च कहने के लिए एक दिन है लेकिन ये दिन दुनियां की आधी आबादी की चेतना के जीत की एक तारीख है। सौ साल से भी अधिक समय पहले दुनियां के एक हिस्से में महिलाओ ने सरकार को चुनने के लिए मतदान का अधिकार की मांग की थी। 1910 में जर्मनी की एक्टिविस्ट क्लारा जेटकीन के प्रयासों से विश्व महिला दिवस की शुरुवात हुई थी। 114सालो में आधी आबादी ने जितनी तेजी से गति पकड़ी है अगर उसे देखे तो ये लगता है कि आने वाले समय में वे बराबरी की बात को छोड़ दे तो वे आगे निकलने का सामर्थ्य रखती है। पश्चिमी देशों में स्त्रियों के अधिकार के मायने हमारे देश की तुलना में जुदा जुदा है। वे पहनावा, रहन सहन , कामकाज के साथ विवाह,परिवार के आकार और मतभेद होने की स्थिति में स्वतंत्र जीवन जीने का भी अधिकार रख रही है। उनके यहां स्त्रियां अगर देह व्यापार जैसे कार्य में भी संलिप्त है तो समाज में उनके सम्मान में कमी नहीं है।
इससे परे हमारा देश अनेकता में एकता और विभिन्न संस्कृतियों का बेमिसाल जोड़ है। हमारी सभ्यता और संस्कार पश्चिम से परे है। स्त्रियों को परिवार में सम्मान का प्रतीक माना गया है। जिस देश में पुरुष महिलाओं को गायत्री, दुर्गा,काली,सरस्वती,लक्ष्मी, के रूप में स्तुत रखा हुआ है उस देश में मां की महत्ता सर्वोपरि है।
देश के संविधान के अनुच्छेद 14,15, 16में स्त्रियों को पुरुषो के समान बराबरी का अधिकार दिया हुआ है। आजादी के पहले पचास सालों में स्त्रियों की सहभागिता उतनी नहीं थी जितनी होनी चाहिए थी लेकिन इस देश की महिलाओ को डा मनमोहन सिंह का आभार मानना चाहिए जिन्होंने विदेशी कंपनियों के लिए प्रवेश का द्वार खोले, कंप्यूटर के आगमन के साथ बहुराष्ट्रीय का आगमन और अंग्रेजी भाषा में खुले स्कूल कालेजों ने स्त्रियों के भाग्य पलट कर रख दिए। परिवार के आकार में कमी के चलते शिक्षा का बढ़ावा हुआ और निजी क्षेत्र में रोजगार के बढ़ते अवसरो ने स्त्रियों को चारदीवारी के बाहर की दुनियां को देखने समझने का अवसर मिला। आज के दौर में अंतरिक्ष से लेकर भू गर्भ तक के हर क्षेत्र में स्त्रियों की सहभागिता है। भारत सरकार में लोकसभा के निर्वाचन क्षेत्रों में 33प्रतिशत आरक्षण की घोषणा ने इस बात पर बल दिया है कि बराबरी के मामले में निर्णय की शुरुवात है।
आज का दिन आधी आबादी के पूरे जश्न का है। हर परिवार की जिम्मेदारी रहे कि वे अपने बेटियो को योग्य और सामर्थ्यवान बनाए। संकट के दौर में उन्हें बेहतर निर्णय के लिए उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाने की जिम्मेदारी पूरे समाज की है
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