Babuaa Desk

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एक तरफ पहाड़ और घुमावदार रास्तो के अलावा कल कल बहती अलकनंदा, भागीरथी और गंगा के लिए विख्यात उत्तराखंड के देवभूमि में भगवान शंकर ,बद्रीविशाल, और गंगोत्री के बाद 4 छोटे धाम की अंतिम कड़ी में यमनोत्री की ओर जाना था हमने गंगोत्री में जल भरते समय चिंतन किया कि क्यो न धर्म के अनुसार गया गंगोत्री का जल रामेश्वरम में चढ़ाने की परम्परा को मूर्त रूप दे दिया जाये। चिंतन, योजना और योजना मूर्त रूप में बदलने में समय नही लगा और ये तय हुआ कि अब देहरादून और फिर जो भी आगे सुविधा मिले उससे रामेश्वरम पहुँचा जाए। सुबह 7.15 पर हम हर्षिल से देहरादून के लिए रवानगी डाल चुके थे। उत्तरकाशी होते हुए टिहरी को एक तरफ छोड़ते हुए ऊंचाइयों के शीर्ष पर एक बार फिर सफर हुआ। 20 किलोमीटर का सफर 1 घण्टे में हो रहा था ऐसा लग रहा था कि हम देहरादून समय पर नही पहुँच पाएंगे। 1 घण्टा शेष था और 34 किलोमीटर का रास्ता शेष था। इतने में ते।टेंपोट्रेक्स के सामने के चक्के का एक परत खुल गया। आनन फानन चक्का बदला तो 45 मिनट और 34 किलोमीटर की यात्रा शेष थी। 5.15 बज चुके थे। इंडिगो में रिकवेस्ट डाले कि ऐसी घटना हो गयी है तो उन्होने 6 बजे तक का समय दिया। एयरपोर्ट के रास्ते मे जाम और 2 जगह रास्ता भूलने के कारण 6.15 पर एयरपोर्ट पहुँचे।तब तक विकल्प में फ्लॉइट न मिलने की स्थिति में टेम्पोट्रेक्स से ही दिल्ली जाने का विचार बना चुके थे। शुक्र है कि फ्लॉईट 25 मिनट देर से आई और ईश्वर ने हमारा साथ दिया। अगले दिन हम लोग दिल्ली से उड़कर सुबह 10 बजे मदुरै पहुँच गए। मीनाक्षी मंदिर से 20 मीटर की दूरी पर होटल मिल गया। रामेश्वरम याने राम ईश्वरम

27 May 2022 09:59AM,
by: Babuaa Desk