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भारत के दक्षिण को पूर्व,पश्चिम उत्तर की तुलना में ज्यादा कठिन क्षेत्र माना जाता रहा है।खासकर भाषाई मामले को लेकर विशुद्ध संस्कृत भाषा से उपजे तमिल, तेलगु, मलयालम और कन्नड़ भाषा को पढ़ना, लिखना, और बोलना अत्यंत कठिन काम तो है ही, समझना भी आसान नही है। इन भाषाओं की लिपि देखकर तो और भी समझ मे आ जाता है कि ये भाषाएं सरल नही है। हिंदी भाषी क्षेत्र में इन भाषाओं के लोगों के आने के बावजूद इनका सम्मिश्रण नही हो पाया है लेकिन इन क्षेत्र के कलाकारों ने दक्षिण को जोड़ने का बहुत बड़ा काम किया है। दक्षिण की नायिकाओं ने तो हिंदी भाषी फिल्मो में ड्रीम गर्ल रही है। वैजयंती माला, पद्मिनी, हेमा मालिनी, जया प्रदा, श्रीदेवी,दिव्या भारती, लक्ष्मी, सहित अनेक नायिकाओं ने जोड़ने का काम किया है।नायकों में भी,अरविंद मोहनलाल, कमल हासन, नागार्जुन, चिरंजीवी नायको ने हिंदी फिल्मों में उपस्थिति दी लेकिन जिस कलाकार का जादू हिंदी भाषी क्षेत्र में सर चढ़ कर बोला वे रजनीकांत है। पश्चिम के जन्मे शिवाजी राव गायकवाड़ के बस कंडक्टर से नायक बनने की कहानी चाय वाले के प्रधानमंत्री बनने के समान ही है।  जादू का दक्षिण या दक्षिण के जादू

13 Dec 2021 04:56AM,
by: Naveen kumar sahu
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इसी साल 98 के उम्र में दिलीप कुमार ने आखरी सांस ली थी।आज होते तो 99 के फेर में पड़ते लेकिन नही पड़ पाये और सुपुर्द ए खाक हो गए। भारत जहां आज़ाद के पहले से लेकर आज़ादी के बाद के वर्षों में मनोरंजन का एक मात्र साधन फिल्में हुआ करती रही है उस साधन में दिलीप कुमार एक साध्य थे अभिनय के। उनके जमाने के राज कपूर, देवानंद सहित अन्य कलकरोवके हुजूम में दिलीप कुमार अभिनय के चलते फिरते प्रयोगशाला थे। 1950 से लेकर 1965 तक दिलीप कुमार सफलता के बड़े नाम थे, सफलता के पर्याय। जोगन, बाबुल,दीदार, तराना, दाग, अमर, उड़नखटोला, इंसानियत, देवदास, नया दौर, यहुदी, मधुमती, पैगाम, आज़ाद, कोहिनूर, आन, मुगल ए आज़म, गंगा यमुना, लीडर, दिल लियस दर्द लिया,राम श्याम, आदमी उनकी लगातार सफल होने वाली फिल्में थी। दिलीप कुमार ने 1952 में पहली टेक्नी कलर फिल्म "आन" में अभिनय किया था जिसका प्रीमियर लंदन में हुआ था।   दिलीप कुमार याने दमदार कुमार

11 Dec 2021 04:33PM,
by: Naveen kumar sahu
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इसी साल 98 के उम्र में दिलीप कुमार ने आखरी सांस ली थी।आज होते तो 99 के फेर में पड़ते लेकिन नही पड़ पाये और सुपुर्द ए खाक हो गए। भारत जहां आज़ाद के पहले से लेकर आज़ादी के बाद के वर्षों में मनोरंजन का एक मात्र साधन फिल्में हुआ करती रही है उस साधन में दिलीप कुमार एक साध्य थे अभिनय के। उनके जमाने के राज कपूर, देवानंद सहित अन्य कलकरोवके हुजूम में दिलीप कुमार अभिनय के चलते फिरते प्रयोगशाला थे। 1950 से लेकर 1965 तक दिलीप कुमार सफलता के बड़े नाम थे, सफलता के पर्याय। जोगन, बाबुल,दीदार, तराना, दाग, अमर, उड़नखटोला, इंसानियत, देवदास, नया दौर, यहुदी, मधुमती, पैगाम, आज़ाद, कोहिनूर, आन, मुगल ए आज़म, गंगा यमुना, लीडर, दिल लियस दर्द लिया,राम श्याम, आदमी उनकी लगातार सफल होने वाली फिल्में थी। दिलीप कुमार ने 1952 में पहली टेक्नी कलर फिल्म "आन" में अभिनय किया था जिसका प्रीमियर लंदन में हुआ था।   दिलीप कुमार याने दमदार कुमार

11 Dec 2021 04:33PM,
by: Naveen kumar sahu
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एक दुर्घटना की खबर कानो तक पहुँचती है, विश्वास करने और न करने के बीच यथार्थ अपने आवेग से मस्तिष्क को ये स्वीकारने को बाध्य कर देता है कि सच यही है कि विपिन रावत सर नही रहे।उनके देह का अवसान हो गया। संसार के सबसे प्रमाणित सत्य की शरीर नश्वर है की पुनः पुष्टि हुई। ये भी तय हुआ कि आपका आना और जाना आप पर निर्भर नही है।आप प्रारब्ध में फसेंगे और मृत्यु आपको आगोश में ले लेगी।।कल भी यही हुआ। कुन्नूर के जंगलों में विपिन( जंगल का ही पर्यायवाची) रावत का सपत्नीक दुखद निधन हो गया। किसी स्त्री के लिए उम्र के उत्तरार्द्ध में एक पति से ज्यादा मित्र की आवश्यकता के रूप जीवनसाथी बेहतर विकल्प होता है , ऐसे जीवनसाथी ने आखरी तक एक दूसरे का साथ नही छोड़ा ये भी भाग्य का सुखद पहलू है। विपिन रावत के अवसान के मायने

09 Dec 2021 05:37AM,
by: Naveen kumar sahu
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अगर आपको आंख बंद कर धर्मेंद्र की किसी फिल्म का नाम लेने के लिए कहा जाए तो शायद आप शोले का नाम ले सकते है ये फिल्म उनके कद काठी के अनुरूप की आदतन फिल्मो की एक कड़ी थी लेकिन मैं जिस धर्मेंद्र को जानता हूं वह धर्मेंद्र सत्यकाम, दोस्ती, चुपके-चुपके, दिल्लगी फिल्म का धर्मेंद्र है। आमतौर पर व्यावसायिक मसाले वाली फिल्मों में जिस कलाकार को एक बार सफलता मिल जाती है उसके बाद फिल्में बदलती जाती है लेकिन नायकत्व जस का तस रहता है। धर्मेंद्र जब फिल्मो में आये तो पारिवारिक विषयो के इर्दगिर्द ही कथानक घूमा करती थी।जब दर्शक विषयांतर हुआ तो अपराध जगत का आगमन हुआ। खलनायक के खलनायकत्व को खत्म कर बुराई पर अच्छाई की जीत का नया संसार जन्म लिया तो भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में दरासिंग हीमेन नही कहलाये बल्कि धर्मेंद्र को ये खिताब मिला था। अमूमन वे हर फिल्म में बुरे किरदारों के नायक हुआ करते थे।अगर उनकी फिल्मों का पोस्टमार्टम किया जाए तो वे इतनी चोरी कर चुके है कि वे अमेरिका में रहते तो पांच एक सौ साल की सज़ा पा जाते। उनकी ऐसी भी फिल्मो को हमने देखा है लेकिन एक ऐसा व्यक्ति जिसकी दंतपंक्ति दर्शनीय हो और मुस्कान कहर बरपाने वाली हो उसको भले ही शोले पहिं में वीरू के रूप में देखना सुखनवर हो लेकिन इस कलाकार की आत्मा को देखना हो तो निश्चित रूप से सत्यकाम,चुपके चुपके,दोस्ती, और दिल्लगी जरूर देखना चाहिए। ये फिल्में धर्मेंद्र के वीरू छाप फिल्मो से पलट अहिंसक फिल्में है जिनमे धर्मेंद्र को ज्यादातर एक अध्यापक की भूमिका में जीने का अवसर मिला था। इन फिल्मों में धर्मेंद्र की आत्मा को इस बात का सुकून मिला होगा कि उन्हें खलनायको को पीटने से निजात तो मिली। इन फिल्मों में वे सम्मान के हकदार है ये बात मैं दमदारी से कहूंगा। इनसे जुदा एक फिल्म जेहन में है- प्रतिज्ञा। ये फिल्म मेरी पसंदगी की रही है क्योंकि अपने स्वभाव के विपरीत धर्मेंद्र की हास्य भूमिका में आना पड़ा था।नाच न आने के बावजूद नाचना पड़ा था।  एक अदद से नायक -धर्मेंद्र

08 Dec 2021 05:26AM,
by: Naveen kumar sahu
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पत्रकारिता की दुनियां में अनेक ऐसे हस्ताक्षर है जिनको देखकर आप सीखने की लगन को जुनून में बदल सकते है। मेकियावली ने कहा था हर व्यक्ति अपने युग का शिशु होता है। जिस युग मे जन्म लेता है उस युग की परिस्थितियां उसे प्रभावित करती है। पत्रकारिता से परिचय के साथ साथ ही 1985 के काल मे दूरदर्शन पर चुनावी विश्लेषण के लिए दो किरदारों ने मोर्चा सम्हाला था। हिंदीभाषियों के लिए विनोद दुआ हुआ करते थे और अंग्रेजी भाषा केलिए प्रणव राय होते थे। आमतौर पर प्रसारण के लिए सरकार के तंत्र को सिर्फ सरकार के उजले पक्ष को परोसने का एक नियंत्रित संसाधन माना जाता है लेकिन इस मिथक से विनोद दुआ ने लोगो के मिथक को तोड़कर निष्पक्ष पत्रकारिता की नई चिंगारी जलाई थी क्योंकि कुछ सालों पहले ही देश ने व्यवस्थापिका ने कलम की निगहबानी पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया था। एक दौर में मनपसंद लिखवाना ही संस्कृति बन गई थी। बहरहाल विनोद दुआ ने दूरदर्शन पत्रकारिता की परिभाषा बदली। वे आक्रामकता के पैरवीकार थे। अच्छे अच्छे मंत्रियों, सांसदों को विनोद दुआ ने साहसिक रूप से जनता के समक्ष रखा। मुझे अच्छे से याद है कि माधवराव सिंधिया को उन्होंने हमारी सरकार कहने पर आपकी सरकार कह कर प्रतिप्रश्न किया तो सिंधिया जी भी हड़बड़ा गए थे। खत्म हुआ पत्रकारिता के जायके का सफर

05 Dec 2021 03:33AM,
by: Naveen kumar sahu