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इस दुनियां में कितने भी स्वचलित मशीनों का अविष्कार क्यो न जाए लेकिन उनको चलाने के लिए मनुष्य के हाथ की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता है। स्वचलित मशीन भी हाथो के सहयोग से ही बनेगी इस सर्वमान्य सत्य को कभी खारिज नही किया जा सकता है। ये दुनियां मशीनों पर निर्भर कुछ 100- 200 साल पहले ही हुई है उसके पहले सारे काम इंसान के हाथ के ही भरोसे हुआ करते थे। बड़े से बड़े पुल, बड़ी से बड़ी इमारत, लंबी लंबी सड़के, सभी प्रकार के निर्माण और विध्वंस भी मानव के हाथ पर ही निर्भर था। हाथ की कीमत को जिन्होंने समझा वे शासक थे जाहिर है उन्होंने निर्माण के लिए मानव को माध्यम बनाया और निर्माण की आतुरता ने शोषण को जगह भी दी। धीरे धीरे आदमी को काम का माध्यम बना कर उसके सामर्थ्य से ज्यादा काम लेने की परंपरा शुरू हुई ओर फिर श्रम बिंदु के शोषण की पराकाष्ठा भी देखा गया। श्रम की भट्टी में इंसान को झोंक दिया गया। उसके एक दिन में सोने के 8-9घंटे के अलावा बाकी के 15 घण्टे काम मे जाया होने लगा।अंततः श्रम का शोषण मानवीयता की हद को पार करने लगा तो श्रम बिंदु ने बगावत का थाम लिया। 1 मई18884 को शिकागो में हज़ारो मजदूरों ने काम के असीमित घण्टो के खिलाफ सड़क पर आगये। हिंसात्मक आंदोलन में गोलीबारी हुई और कई मजदूरों को जान से हाथ धोना पड़ गया। 1889 में मास्को में काम के घण्टे 8 निर्धारित हुए और यही से मजदूर दिवस की शुरुवात हुई। अब 8 घण्टे काम 8 घण्टे मनोरंजन और 8 घण्टे आराम के तय किये गए। भारत मे इसे 1923 मे मनाना शुरू किया गया। अभी भी विश्व के सभी देश एक ही दिन मजदूर दिवस नही मानते है। सबसे बड़े देश अमेरिका में श्रमिक दिवस अक्टूबर के आखिर सोमवार को मनाया जाता है। जो भी हो एकता में दम है ये 1 मई सिद्ध करता है जिसने 8 घण्टे की समय सीमा के लिए हाथ को हथोड़े में बदल दिया। ये हाथ नहीं हथौड़ा है

01 May 2022 10:27AM,
by: Naveen kumar sahu
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आज शहीद दिवस है, बहरी अंग्रेज हुकुमत के कान में आज़ादी के बिगुल की आवाज़ पहुँचाने वाले भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को अदालत द्वारा निर्धारित तारीख 24 मार्च 1931 के एक दिन पहले ही याने 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गयी थी। आज़ाद देश मे व्यक्ति को अदालत के फैसले के विरुद्ध कृत्य किये जाने पर सरकार के खिलाफ ही जनमानस उद्वेलित हो जाता है,मानव अधिकार से जुड़े लोग न्यायपालिका में हस्तक्षेप की याचिका लगाते है। न्याय की उम्मीद बनी रहती है लेकिन गुलाम देश मे ये सब बातें नही होती है । दरअसल अंग्रेजी हुकूमत को देश छोड़ने के लिए भय की जरूरत थी ऐसा क्रांतिकारी लोगो के जेहन में था वे विदेश में होने वाली क्रांतियों से ये सबक ले चुके थे। 1917 की रूस क्रांति से शोषकों के खिलाफत की आग से देश के नवयुवक भी तप कर जुनूनी हो चले थे। भगतसिंह ने जलियांवाला बाग और साइमन कमीशन का विरोध करने वाले लाला लाजपत राय के विरुद्ध अंग्रजो के बर्बर व्यवहार से तमतमा गए थे। यही से उन्होंने देश मे एक विचार शोषकों के खिलाफ प्रचारित करना शुरू किया। वे नवयुवकों को जोड़ते जा रहे थे और उनके साथ देश के सबसे निर्भीक आज़ाद चंद्रशेखर का साथ एक नई विचारधारा के साथ अंग्रेजो के खिलाफ लामबंद होते जा रहे थे। देश मे तेज़ी से एक क्रांति की बुनियाद रखी जा रही थी जिसे अनेक लोग पीछे से मदद दे रहे थे। ये वे लोग थे नो जानते थे कि अंग्रेजों के मन मे भय होना अनिवार्य है। महज 26 साल की उम्र में जब अधिकांश युवा अपने ख्वाब चुनते है केरियर बनाते है, विवाह जैसी संस्था में जुड़ कर अमन चैन की दुनियां खोजते है उस उम्र में देश का ये युवक फांसी पर देश की आज़ादी और शोषकों से आज़ादी के लिए प्राण न्योछावर कर दिए। असेम्बली में बम फेंकना असाधारण घटना थी लेकिन भगतसिंह ने अंजाम दिया। वे आसानी से असेम्बली से जा सकते थे लेकिन उन्होंने बहरी सरकार की कान में बात लाने के लिए न्यायालय का सहारा लिया। वे जो बात लोगो तक नही पंहुचा सकते थे वो बाते पहुँचाने में सफलता पाई। भगतसिंह की फांसी से पहले की जिंदगी कितनी बदतर थी ये पढ़ लेने से ही रूह कांप जाती है । जितना उनका आकार था उससे छोटा कमरा था। कोई सुविधा नही थी सो विश्व का सबसे लंबा भूख हड़ताल (116 दिन) उन्होंने किया। इतना त्याग करने के लिए कितनी मजबूत इक्छा शक्ति की जरूरत होती है? आज देश उनकी शदाहत को नमन कर रहा है। पंजाब में आज उनकी श्रद्धा में राजकीय अवकाश घोषित किया जाना सच्ची श्रद्धांजलि है। देश के युवा इस शहीद ए आज़म से अपने मार्ग में आने वाले चुनौतियो का कैसे सामना कर सकते है सीख सकते है। भगतसिंह सिंह एक विचाधारा है

23 Mar 2022 05:04AM,
by: Naveen kumar sahu
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यूँ तो भारत देश मे क्रिकेट का खेल हो तो वैसे ही दीवानगी देखते बनती है। पुरुषों के प्रभुत्व वाले खेल में खिलाड़ियों की स्थिति राजनीतिज्ञों, फ़िल्म कलाकार के बराबर या कभी कभी उनसे भी ज्यादा होती है। पुरुषों के साथ साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलने वाली महिलाओं ने भी इस खेल मे रुचि दिखाना शुरू किया और अब क्रिकेट के आका भी समझने लगे है कि महिलाएं भी इस खेल में आगे बढ़ रही है। आज अगर क्रिकेट के प्रशंसकों ने वेस्टइंडीज के खिलाफ भारतीय महिला टीम को बेटिंग और बॉलिंग के साथ फील्डिंग करते देखा होगा तो उनको पुरुषों के बराबर या कभी कभी उनसे बेहतर खेल देखने का मौका मिला होगा। भारतीय महिला क्रिकेट टीम इन दिनों न्यूजीलैंड में एकदिवसीय क्रिकेट चैंपियनशिप में शिरकत कर रही है। अपने पहले मैच में पाकिस्तान को हराने में बाद मेजबान न्यूजीलैंड से हार के बाद आज वेस्टइंडीज के खिलाफ करो या मरो की पोजिशन में आ गयी थी। आज का दिन स्मृति मांधना और हरमनप्रीत कौर का था जिन्होंने ऐसा मोर्चा सम्हाला कि इसकी चर्चा बहुत दिनों तक होगी। स्मृति और हरमनप्रीत दोनो ही देश की स्थापित अनुभवी खिलाड़ी है। स्मृति को दुनियां में शानदार आक्रमक ओपनर के नाम से जाना जाता है वहीं हरमनप्रीत को दाये हाथ के आक्रामक बल्लेबाज के रूप में पहचान मिली हुई है लेकिन आज दोनो बल्लेबाजों ने अपने स्वभाव के विरूद्ध पहले बल्लेबाज़ी की दोनों ने चौथे विकेट के लिए 182 रन की शानदार पारी खेलकर टीम को 317 रन के शानदार खाते पर पहुँचाने में सफल रही। स्मृति और हरमनप्रीत ने अपने अपने शतक 123 और 109 रन का योगदान दिया। ये शतक टीम के गेंदबाज़ों के लिए बड़ा सहयोग था जिसके कारण वेस्टइंडीज की टीम शुरू के 12 ओवर में 100 रन पर 1 विकेट खोने के बाद ताश के पत्तो के समान 162 रन पर ढह गई। 155 रन की जीत भारतीय महिला क्रिकेट टीम के लिए आगे इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका से खेलना है इनसे मिलने वाली जीत सेमीफाइनल का रास्ता खोलने वाली होगी। ये आयोजन भारत की कप्तान मितालीराज के लिए अंतिम चेम्पियनशिप है इसके बाद वे संन्यास लेने वाली है अगर टीम शानदार प्रदर्शन करती है तो ये उनके लिए भी यादगार रहेगा। वैसे दोनो खिलाड़ी क्रिकेट के तीनों फार्मेट टेस्ट,वनडे और टी20 के जबरदस्त खिलाड़ी है। ऑस्ट्रेलिया में होनेवाले लीग मैच में दोनों की भारी मांग है। आनेवाले मैच में इन दोनों के शतक से दूसरे खिलाड़ी प्रेरणा लेंगे। शाबाश स्मृति शाबाश हरमन

13 Mar 2022 05:49AM,
by: Naveen kumar sahu
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"आपकी सेवा" नाम तो फिल्म का था जिस फिल्म के साथ लता मंगेशकर ने अपने गायिका सफर की शुरुआत की थी। तब न तो लता मंगेशकर ने सोचा रहा होगा और न ही किसी ने सोचा होगा कि वे मानव सेवा के लिए इतनी लंबी गायन यात्रा करेंगी वह भी अकेली। दरअसल भगवान ने लता मंगेशकर को सेवा के लिए ही बनाया था। गायन की दुनियां में उनका आना अपने परिवार को आर्थिक सहयोग के संबल प्रदान करना था। इस सेवा को उन्होंने अपने जीते जी बखूबी निभाया। अपने परिवार के अलावा उनका देश भी परिवार था जिसके मनोरंजन का भार भी उन्होंने उठाया । लगभग 63 वर्ष तक सक्रिय रहते हुए उन्होंने तीन पीढ़ियों के लिए स्वर दिया। शोभना समर्थ, तनुजा औऱ काजोल इस बात के उदाहरण है कि लता ने तीनों के लिए स्वर दिया। लता मंगेशकर जब स्वर की दुनिया मे कदम रख रही थी तब गायन में शमशाद बेगम औऱ नूरजहां का जलवा था। तब के दौर में नाक के भर गायन खूबी मानी जाती थी। लता मंगेशकर ने भी अपने आरंभिक दौर में ये ये नुस्खा आजमाया लेकिन जब वे स्वाभाविक हुई तो दुनियां नर जाना कि स्वर मिठास क्या होती है। "आएगा आएगा आएगा आने वाला" ये गीत महल फिल्म का था जहां से नई लता पल्लवित हुई थी। इसके बाद फिल्म दुनियां में हर नायिका के लिए लता मंगेशकर का स्वर अनिवार्य सा हो गया था। हर संगीतकार की चाहत हुआ करती थी कि लता का गाया गीत जरूर हो। लता मंगेशकर इतनी विराट हो गयी थी कि उनके रहते कोई भी दूसरी गायिका स्थाई नही हो पाई। यहां तक कि आशा भोंसले को भी केवल कैबरे औऱ तवायफखाने के गाना गाने की मजबूरी ही थी। क्लब के दौर आने पर दूसरी गायिकाएं भले ही उभरी लेकिन संगीत और स्वर की समझ का मापदंड अपनाया गया तो विकल्प लता मंगेशकर ही रही। उनके उम्र ने गायन की सीमा तय की तब 1988 में अल्का याग्निक औऱ श्रेया घोषाल के लिए रास्ता बना। लता मंगेशकर के गाये बेहतरीन गीतों की सूची भी बनाई जाए तो 500 से अधिक गाने होंगे जिनमे वे अपनी अंतरात्मा से गानों को गायी होंगी लेकिन जब कभी आंख बंद कर लता जी को सुनना चाहे तो एक गीत" मेरी आवाज ही पहचान है गर याद रहे" जरूर सुनना चाहिए। यही गीत उनके नश्वर शरीर के पंच तत्व में विलीन होने के बाद उनकी पहचान रहेगी। लता मंगेशकर जी अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नही किया वे जिंदगी भर क्लब में होने वाले गाने नही गायी। अहसास फिल्म में गाये इकलौते क्लब गाना "रूठो ना" को उन्होंने अपनी जिंदगी की भूल माना था। वे सरस्वती की देन थी आत्मा नही बेच सकती थी। उनके गायन का सफर फिल्मो से 2007-2008 के पास थमने लगा था। ऐश्वर्या राय के लिए" हमको हमी से चुरा लो" सम्भवतः अंतिम फिल्म के लिए गाया हुआ गाना था। इसके बाद वे भजन की दुनियां में सिमटते गयी। वस्तुतः स्वर की साधना के लिए लता मंगेशकर के पास यही विकल्प था। वे देश दुनियां में लता दीदी के नाम से जानी जाती रही है। दीदी तेरा देवर दीवाना जब उन्होंने गाया था तब लोगो ने "दीदी तेरा दुनियां दीवाना" भी कहा था। लता मंगेशकर की आवाज़ देश की हवा में घुली हुई है। ऐसा कोई दिन नही जाता जब लता मंगेशकर की मिश्री जैसी आवाज़ कानो में न गूंजती हो। इंसान मर कर यादों में सिमट जाता है लेकिन लता जी की आवाज़ अजर अमर है। शरीर से वे हमारे बीच न सही आवाज़ से तो है। उनकी आवाज़ ही पहचान है ये याद रहेगा हमे। उड़ गई स्वर कोकिला

06 Feb 2022 05:46AM,
by: Naveen kumar sahu
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आज ही के दिन याने 30 जनवरी 1949 को एक व्यक्ति के रूप में महात्मा गांधी के जीवन का अंत हो गया था लेकिन विचार कभी मरते नहीं है, गांधी जी के भी विचार समय के साथ सामयिक होते गए। गांधी जी देश की आबादी के भविष्य को जान रहे थे इसमे होने वाली वर्द्धि को समझ रहे थे। एक इंसान जन्म लेता है तो एक पेट और दो हाथ लेकर आता है अर्थात एक के लिए दो की व्यवस्था पूर्व निर्धारित होती है।हर व्यक्ति समसामयिक होता है भविष्य भी देखता है तो अपने जीवनकाल के बीस तीस साल आगे देखता है लेकिनमहात्मा गांधी ने देश के पचास साल का आंकलन कर कुटीर उद्योग को सहकारिता में साथ आगे बढ़ाने का विचार रखा था। महात्मा गांधी के समय देश शहरों का देश न होकर गाँवो का देश था। कृषि मुख्य रोजगार और आय का साधन था। परंपरागत रोजगार के रूप में गाँव की आवश्यकता ही तत्समय में प्रमुख थी। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्थानीयकरण के सिद्धांत को महात्मा गांधी समझ रहे थे इसलिए स्थानीय आवश्यकता और पूर्ति के लिए कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के पक्षधर थे। महात्मा गांधी के अनुसार व्यक्ति की आवश्यकता असीमित न होकर सीमित थी जिसमे मूलभूत आवश्यकता के रूप में रोटी, कपड़ा और अंत मे मकान था। रोटी के लिए कृषि मुख्य साधन था और देश मे अभाव भी था। उन्नत खेती के लिए आधुनिक तकनीक नहीं थी। खेती मानसूनी जुआँ कहलाती थी। सिचाई के संसाधन सीमित थे, खाद बीज की आवश्यकता बनी हुई थी।इसके विकल्प के रूप में महात्मा गांधी स्थानीय सहकारिता पर बल देते रहे। वे ये समझाते रहे कि देश मे श्रम आसानी से उपलब्ध है और इसके बल पर कुछ भी हासिल किया जा सकता है। गाँव मे छोटे छोटे उद्योग की सामयिकता को उस समय शिक्षा के अभाव में नही सीखा गया लेकिन कुटीर उद्योग की महत्ता को सर्वाधिक आबादी वाले देश चीन ने महज तीन दशक पहले समझा और आज स्थिति ये है कि हर देश की बुनियादी आवश्यकताओं की आपूर्ति चीन ही कर रहा है अर्थशास्त्र में उद्योग के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता कच्चे माल की उपलब्धता है । चीन ने हर गाँव मे कच्चे माल की उपलब्धता को सुनिश्चित किया और गाँव पूरी आबादी को निर्माण कार्य मे लगा दिया। महात्मा गांधी के रोजगार परक कुटीर उद्योगों की परिकल्पना को यदि सरकारे समुचित रूप से व्यवस्थित कर लेती तो आज दुनियां में चीन के स्थान भारत खड़ा होता। समय कभी भी पीछे नही होता है। महात्मा गांधी में कुटीर उद्योग की परिकल्पना के आधार पर आज अमूल , लिज्जत , डी मार्ट , पतंजलि,जैसी स्थानीय संस्थाएं मिसाल कायम कर रही है। यदि हम देश मे होने वाले आयात को ध्यान में रखकर उसके विकल्प के रूप में स्थानीय व्यवसाय के लिए आदर्श वातावरण तैयार कर पाए तो देश मे निजि रोजगार को बहुत बड़ा मंच मिल सकता है। सरकारी रोजगार की अपनी सीमा है हर किसी को सरकारी रोजगार नही मिल सकता है लेकिन कुटीर उद्योग को अपना कर रोजगार के अवसर जरूर निर्मित किये जा सकते है। यही महात्मा गांधी को दी जाने वाली सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है। छत्तीसगढ़ के परिपेक्ष्य में देखे तो इस राज्य को धान का कटोरा माना जाता है। धान से मिलने वाले चाँवल के बहुउपयोग है। धान के छिलके से लेकर चाँवल तक हर वस्तु की उपयोगिता है। राज्य के मुख्यमंत्री धान के खेती में , पर चाँवल के अन्य उत्पाद के लिए भी आदर्श वातावरण बनाया जाए तो कुटीर उद्योग के रूप में कार्य करने के लिए राज्य के पास धान के रूप में प्रचुर मात्रा में कच्चा माल उपलब्ध है। इसी प्रकार बुनकर उद्योग सहित शिल्प का कार्य भी छत्तीसगढ़ राज्य का ग्रामीण उद्योग है।मुख्यमंत्री भूपेश बघेल स्वयं कृषक है और राज्य के ग्रामीण परिवेश की उपलब्धता और विशेषता को जानते समझते है। वे महात्मा गांधी के कुटीर उद्योग और स्थानीय रोजगार के सिद्धांत पर अमल कर गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ की साकार होती परिकल्पना में क्रांति का आव्हान कर सकते है। गांधी और रोजगार

30 Jan 2022 07:46AM,
by: Naveen kumar sahu