लेख

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एक उम्र थी जो जी लिया फिर रेत की तरह मुट्ठी से रीत गयी जिंदगी। यही सच है कि इस दुनियां में हर आने वाले को जाना है सो मन्नू आयी,रही, ढेर सारा लेखन कार्य किया और आज इस दुनियां से रुखसत हो गयी। मैं मन्नू को एक लेख से जाना था जिसमे उन्होंने गंगा घाट जाते समय हनुमान के मंदिर में अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ने वाले विद्यार्थियों के द्वारा "हाय हनु" कहने पर भाषा के साथ देश की बदलने वाली संस्कृति की तरफ इशारा किया था। उनके लेखन की शैली ने मुझे प्रभावित किया और फिर उनके लिखे "आपका बंटी", "त्रिशंकु" औऱ "महाभोज" को पढ़ ही लिया।" यही सच है" इसलिए नही पढ़ा क्योकि रजनीगंधा फिल्म देख लिया था। "आपका बंटी" एक ऐसे बच्चे की मनोदशा थी जिसके माता पिता तलाक के बाद पुनर्विवाह कर लेते है और बंटी सामाजिक मझधार में फंस जाता है। "महाभोज" एक औसत दर्जे के व्यक्ति की कहानी है जो भृष्टाचार के मकड़जाल में फंस के खुद को एक ऐसे अधमरे व्यक्ति के रूप में आभासित होता है जिसे खाने के लिए गिद्ध मंडराते लगते है।" मैं हार गई" औऱ "तीन निगाहों की एक तस्वीर" "आंखों देखा झूठ" मैं पढ़ नही सका, क्यो ? इसका कोई कारण नही है बस पढ़ नही पाया। मन्नू भंडारी एक सशक्त लेखिका रही है जिन्होंने नई कहानी युग के प्रवर्तकों में अपनी जगह बनाई। वे निर्मला वर्मा,कमलेश्वर, भीष्म साहनी सहित अपने पति राजेन्द्र यादव के साथ नए विषय जिसमे आम आदमी का सच सामने आ सकता था की समर्थक थी। महिलाओ के समाज मे स्थिति पर उनकी कलम विद्रोही थी। उन्होंने महिलाओ को सशक्त बनाने, आर्थिक रूप से सक्षम होने, समाज की रूढ़ियों के विरुद्ध खड़े होने का आव्हान किया। जो उनके कहानीकाल में समाज से बगावत ही था। आज जब उन्होंने आंखे मूंदी तो उन्हें आज की सशक्त औऱ सक्षम महिलाओ को देखने का संतोष जरूर रहा होगा। मन्नू नाम से बहुत छोटा है लेकिन रचना का भंडार था इसी कारण वे मन्नू भंडारी थी। चली गई मन्नू

15 Nov 2021 04:04PM,
by: Naveen kumar sahu
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आदिकाल से जब युद्ध अपने से साम्रज्यवादिता के लिए अपरिहार्य हुआ करता था तब युद्ध मे अनेक प्रकार के अस्त्र शस्त्र भी हुआ करते थे। तीर कमान,तलवार, गदा,चक्र जैसे सामान्य अस्त्र शस्त्र तो थे ही एक विशिष्ट प्रकार का भी अस्त्र शस्त्र हुआ करता था जिसे भाला कहा जाता है। अगर आप महाभारत काल मे जाए तो धर्मराज युधिष्ठिर को उत्कृष्ट भाला प्रयोगक माना जाता है। गुरु द्रोण ने युधिष्ठिर को भाला का सर्वश्रेष्ठ शिष्य बताया था। महाभारत युद्ध मे शल्य को युधिष्ठिर ने भाले से ही मारा था।युग बीता देश, लुटेरे आक्रमणकारियों के लुटेरेपन का शिकार हुआ। देश के राजा महाराजाओं के प्रतिद्वंद्विता औऱ देसी गद्दारो के चलते गुलाम , मुगल काबिज़ हुए। मुगलो को महाराणा प्रताप ने अपने भाले की नोंक पर उन्होंने मानसिंह की ग़द्दारी को चुनोती दी थी। आज तक देश महाराणा प्रताप के शौर्य की गाथा गाता है। नीरज चोपड़ा और उनका भाला

09 Aug 2021 04:06AM,
by: Vikash Kumar
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ओलंपिक खेल शुरू होने से पहले भारत ने जिन बेटियो ने से उम्मीद किया था उनमे एक शूटर भी थी जिसे हम सब मनु भाखर के नाम से जानते है। मनु प्रतिभाशाली है और प्रतिभासंपन्न भी। अपने किशोरावस्था से ही उन्होंने बड़ी सफलता देखी है वे विश्व स्तरीय शूटिंग स्पर्धा में स्वर्णपदक की कतार लगा चुकी है। टोक्यो ओलम्पिक में वे सफल नही हुई। उनके पिस्टल ने साथ नही दिया। तकनीकी कारणों से वे 10 मीटर पिस्टल में फाइनल में जगह नही बना सकी। वे पराजित हो गयी यही से उनका आत्मविश्वास डगमगा गया ।वे हर स्पर्धा में पिछ्ड़ते गयी। ओलंपिक खेल की मूल भावना है खेल भावना सबसे महत्वपूर्ण भावना है। पदक तो किसी क निराश नहीं होना मनु

30 Jul 2021 12:22PM,
by: Vikash Kumar
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इस लेख के साथ लगे तस्वीर को ध्यान से मैंने कई बार देखा, आप भी देखियेगा। ये तस्वीर चानू साइकोम मीराबाई की है( मिडिया इन्हें मीराबाई चानू लिखता है)। मणिपुर के रहने वालों के शारीरिक बनावट में आंखे आकार में छोटी होती है। चानू साइकोम मीराबाई मणिपुर से ही है सो उनकी आंखें भी छोटी है पर इन छोटी आंखों में चमक को देखिये। 140 करोड़ भारतीयों की आंखों की चमक को पूरा किये हुए आंख दिखती है,ये आंखे। उनके हाथ मे ओलम्पिक का रजतपदक है चमचमाता हुआ, साथ में है मास्क के पीछे छिपी अरबो रुपये की महंगी मुस्कान ,जो दिखती नही है लेकिन आंखे, जब आप मुस्कुराते है तो अपने आकार से थोड़ी छोटी हो जाती है। ऐसी ही छोटी आंखे मीराबाई की दिख रही है जो उनके चेहरे पर खींची हुई है इस मुस्कुराहट के कारण है। ये मुस्कुराहट उनके ही चेहरे की शोभा होती है जिसके सालो की मेहनत का परिणाम किसी अंतरास्ट्रीय स्तर पर सफल होता है। मीराबाई याने केवल प्रेरणा

25 Jul 2021 04:15AM,
by: Vikash Kumar
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मुझे हमेशा ये कहा जाता है कि मुझे आदमी पहचानना नहीं आता है। मैं चेहरे को देख सकता हूँ,उस चेहरे के माथे पर पड़ते बल को देख सकता हूं। उसके भौ के बीच पड़ते दो सिकुड़न को देख सकता हूं।आंखों की पुतलियों के मेरी पुतलियों से न मिलाना( इसे आंखे चुराना भी कहते है) देख सकता हूँ।मैं उसके चेहरे पर मुस्कुराहट देख सकता हूं। समूचे चेहरे की भाव भंगिमा को देख सकता हूँ लेकिन उसके मस्तिष्क में क्या चल रहा है, वह व्यक्ति किस चेहरे को लेकर मेरे सामने बैठा/ खड़ा है ये कैसे समझ सकता हूँ? कहते है कि जटिल मस्तिष्क हर व्यक्ति के सामने अलग व्यक्ति खड़ा कर देता है। जैसा सामने वाला व्यक्ति व्यक्तित्व पसंद करता है मस्तिष्क वैसा ही व्यक्ति खड़ा कर देता है। आप भी देखते समझते होंगे कि अगर कोई व्यक्ति आपकी खुशामत कर रहा होता है तो आप खुश हो जाते है, महिमा मंडन किसे बुरा लगता है? आपकी कोई बुराई कर रहा होता है या आपकी कमजोरी बता रहा है या आप पर नाराज़ हो रहा है तो आपको बुरा लग जाता है । ऐसे में ये समझ पाना की सामने वाला व्यक्ति किस चेहरे को लेकर आपके सामने खड़ा/बैठा है कठिन हो जाता है।अधिकांश व्यक्ति जिनके बारे में कहा जाता है कि वे व्यक्ति समझ मे पारखी है लेकिन वे उसी चेहरे के पारखी होते है जो उसके सामने होते है, उनके सामने से अदृश्य हुए चेहरे को वे कैसे पहचाने जाएंगे?  कौन सा चेहरा, किसका देखे

18 Jul 2021 04:57AM,
by: Vikash Kumar
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किसी भी फिल्म में केवल नायक ही सब कुछ नही होता है बल्कि चरित्र नायक भी मायने रखते है। केवल चेहरा ही सब कुछ नहीं होता है बल्कि भाव भंगिमा भी महत्व रखती है। केवल अभिभावकों के स्टार होने से बच्चे स्टार नही हो जाते है ,आपमे दम हो तो आप भी अपनी जगह बना सकते है ये बात सीखने के लिए यदि आपको कोई मिसाल या उदाहरण चाहिए तो है ना- शोले के ठाकुर साहब बनाम संजीव कुमार। वैसे जब संजीव कुमार ने फिल्मो में अपना संघर्ष करना शुरू किया था तब एक्टिंग हाउस के प्रोडक्ट्स नही निकल रहे थे लेकिन अभिनय क्षमता रखने वालों की पूछ परख थी। कलाकारों का जमाना था जिसमे अभिनय की गुंजाइश थी ऐसे में गुजरात के हरिहर ने मुंबई का रुख किया। हरिहर से हरिभाई और फिर अटपटे नाम से संजीव कुमार के सफर में खिलौना के एक पागल ने संजीदा अभिनय का ऐसा माइल स्टोन लगाया कि जब वे विधाता में मालिक अभिनय सम्राट दिलीप कुमार के नौकर अबू भाई बने तो उन्होंने खुद को नौकर होने के बजाय दिलीप कुमार को मालिक होने से इंकार करने का अभिनय नही किया था बल्कि चरित्र में जी गए थे।  ठाकुर संजीव कुमार साहब

10 Jul 2021 10:33AM,
by: Vikash Kumar