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हमारे देश मे आज़ादी के पहले से लेकर जब राजा हरिश्चन्द्र जैसी मूक फिल्म ने जन्म लिया था उसके बाद से पहली बोलती फिल्म आलमआरा से लेकर आज तक विशुद्ध मनोरंजन के लिए पहली पसंद फिल्में ही रही है। इन्ही फिल्मो में बने नायकों के अभिनय में पुरुषों ने खुद को रखकर जीवन के सुख दुख को अनुभूत किया है।नायकों के दमदार अभिनय ने थियेटर में ही दर्शको को नौ रस में डुबाने का सामर्थ्य भी रखा।ऐसे ही एक नायक, तत्समय उनको महानायक ही मानना चाहिए क्योंकि वे अभिनय के हर रंग में रंगे। दुख का दामन थामा तो वे एक दौर के बाद खुद अवसाद में डूब गए थे। ऐसे दौर से निकलने के लिए वे हास्य के रंग में भी दिखे तो दर्शको ने उनके अभिनय का लोहा माना। वे फिल्मो की दुनियां में ज्वार भाटा के माध्यम से आये थे इसके बाद उनके अभिनय में निखार हर फिल्म के साथ आते रहा। देवदास, यहूदी,नया दौर, मधुमति, पैगाम, मुग़ल ए आजम,गंगा जमुना, लीडर, दिल लिया दर्द दिया, राम औऱ श्याम, संघर्ष, दास्तान, गोपी उनके पहले दौर की वे फिल्में थी जिसमे केवल औऱ केवल दिलीप कुमार थे। अभिनय में वे शायद जान डालने के लिए ही जन्मे थे।उनको देखकर कभी ये नही लगा कि वे अभिनय कर रहे है बल्कि ऐसा लगता कि जिस किरदार में उन्हें रखा गया है उसे वे आत्मसात कर चुके रहते थे। उनके आगमन के दौर में ट्रेजडी का मसाला अनिवार्य था सो वे इतना रमे कि ट्रेजडी किंग कहलाने लगे। उनके अभिनय काल मे देश में डाकू समस्या बड़ी समस्या रही सो दिलीप साहब भी गंगा जमुना में ऐसे डाकू बने कि आनेवाले कलाकारों को बहुत मेहनत मशक्कत करनी पड़ गयी। दिलीप साहब को लोग ज्यादा जानते है तो मुगल ए आजम के लिए। सलीम की भूमिका के लिए शायद तब से लेकर अब तक कोई भी कलाकार जोखिम मोल नही ले पाया है। यदि आपमे से जिस किसी ने इस फिल्म को देखा होगा तो प्यार किया तो डरना क्या गीत में दिलीप साहब के मौन अभिनय की दमदारी को भी समझ सकते है। अभिनय के सौदागर

08 Jul 2021 01:10AM,
by: Vikash Kumar
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देश की आजादी के लिए अपनी जान लुटा देने वाले अमर शहीद भगतसिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, असफाकउल्लाह, राजगुरु सहित न जाने कितने युवक थे जिनके नामो को अंग्रेजो ने तो अपने कमीनेपन के कारण आतंकवादी नाम देकर यथा नाम तथा गुण का परिचय दिया था अंग्रेजो के जाने के बाद इन महान हस्तियों को भुला देने की भी साज़िश हुई। नरमपंथी हमेशा लल्लोचप्पो के बदौलत ही गुलामी के कपड़े को बदल कर पहनते रहे है इसी के कारण इस देश की न तो राजभाषा जन्म ले सकी न ही धर्म। यहां तो राम भी पार्टीबन्दी के शिकार हो गए तो रामप्रसाद बिस्मिल कैसे बच पाते। उनका नाम भी देश की आज़ादी में बराबर की सहभागिता के कारण जाना जाता है। जितना गांधी का योगदान रहा उससे ज्यादा देश के शहीदों का है जिन्होंने पैदल चलने के बजाय देश के संसद भवन में बहरो की सरकार के कान में बात डालने के लिए बम फोड़ दिया।  कहाँ मिलेंगे बिस्मिल!

11 Jun 2021 01:01PM,
by: Vikash Kumar
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सुनील दत्त, रील के नहीं बल्कि सही मायने में रियल लाइफ में भी एक प्रेमिका,पत्नी , बच्चो के लिए भी एक आदर्श रहे। उनके जैसा नायक हर पत्नी और बच्चे जरूर चाहते होंगे क्योकि उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चे की जिंदगी को बचाने के लिए जितने ईमानदार प्रयास किये वैसा बहुत कम देखने को मिलता है। वे सुचिता के राजनीतिज्ञ भी रहे और निष्ठा के साथ ईमानदारी की भी मिसाल कायम की ।वे चाहते तो दीगर राजनीतिज्ञों की तरह अथाह और अकूत संपत्ति अर्जित कर सकते थे लेकिन वे एक मिसाल रहे। अब की स्वार्थपरक राजनीति में सुनील दत्त ध्रुव तारे की तरह है जो दिशा दिखाने के लिए है लेकिन देखने वाले अंधे है तो सुनील का क्या दोष! बलराज से सुनील दत्त की यात्रा

06 Jun 2021 07:26AM,
by: Vikash Kumar
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इस देश मे संस्कृत से देवनागरी लिपि के सफर में अनेकानेक भाषाओं ने लिखने बोलने की विधि का अविष्कार किया लेकिन तमाम भाषाओं की पछाड़ते हुए हिंदी ने अपना बहुमत बना ही लिया। यद्यपि देश के संविधान में देश की भाषा के मामले में संविधान विदों की बोलती बंद हो गयी थी - राष्ट्र भाषा के चयन में। अंग्रेजी को सीख विदेशी नकल की अंधभक्ति ने हमे गुलाम मानसिकता में जकड़ने सर्वश्रेष्ठ कार्य किया लेकिन हिंदी ने अपना वजूद बनाये रखा। हिंदी को हिंदी के कलमकारों ने एक तरफ सींच कर विराट बनाया तो हिंदी भाषी फिल्मो औऱ बाद में टेक्नालॉजी के बने 4 केंद्रों(पुणे,बंगलूरू, चैन्नई, हैदराबाद), में हिंदी भाषियों के बढ़ती जनसंख्या ने समीकरण बदल कर रख दिया है। आज देश मे समग्र 45 फिसदी आबादी याने 60 करोड़ लोग हिंदी पढ़ते बोलते है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार ने देश मे भाषा की बेड़ियों को तोड़ते हुए लोगो को हिंदी से जुड़ने के लिए विवश किया। हिंदी को स्थापित और प्रतिष्ठित करने में हिंदी समाचार पत्रों के पत्रकारों के योगदान को आज याद करने का दिन है क्योंकि आज के ही दिन जुगल किशोर शुक्ल ने हिंदी के पहले समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड को कोलकाता में जन्म दिया था। अंग्रेजो के शासनकाल में जब कोलकाता देश की राजधानी हुआ करती थी। यहां से पारसी और आंग्ल भाषा मे समाचार पत्र प्रकाशित हुआ करते थे। जुगल किशोर शुक्ल जो मूलतः उत्तरप्रदेश के रहनेवाले थे। उन्होंने जुगत लगाया और अपने सामर्थ्य का इम्तिहान खुद लिया। 30 मई 1826 को जब जुगलकिशोर जी ने पहला अंक निकाला तो लिखा " यह उदंत मार्तण्ड अब पहले पहल हिंदुस्तानियों के हित हेतु जो आज तक किसी ने नही चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगला में जो समाचार पत्र कागज छपता है उनका सुख बोलियों को जानने और पढ़ने वालों को ही होता है। बाकी लोग पराए सुख पर सुखी होते है जैसे पराए सेठ का धनी होना और अपने रहते पराई आंख से देखना वैसे ही जिस गुण में जिसकी पैठ न हो उसको उसका रस मिलना कठिन है और हिंदुस्तानियों में बहुतेरे ऐसे है अब हिंदुस्तानी लोग देख ले । आप पढ़ ले समझ ले। पराई मि उपेक्षा न करे पर अपनी भाषा का मान न छोड़े।"

30 May 2021 08:38AM,
by: Vikash Kumar
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आमतौर पर सारी दुनियां में ये माना जाता है कि एवरेस्ट पर पहला कदम रखनेवाले व्यक्ति एडमंड हिलेरी थे। इसका कारण भी है कि वे एवरेस्ट विजय अभियान के नेतृत्वकर्ता थे। एडमंड हिलेरी के साथ भारत के सबसे प्रतिभावान शेरपा भी साथ गए थे। एवरेस्ट पर जीत के तेनज़िंग उतने ही हक़दार है जितने हिलेरी। कहा तो ये भी जाता है कि हिलेरी से पहले तेनज़िंग पहुँचे थे क्योकि हिलेरी को सहयोग देने के लिए हाथ तेनज़िंग का था। बात आई गयी हो गई क्योकि एवरेस्ट पर जीत के शुरुवात के वर्ष 1951 के बाद सालो गुजर गए है। जब हिलेरी और तेनज़िंग ने एवरेस्ट पर विजय पाई थी तो संसाधन अत्यंत कम थे। ऐसा नही था कि तेनज़िंग ने 1951 के पहले प्रयास नहीं किया था हिमालय के ऊंचे चोटियों को छूने की 1935 से वे अनेक पर्वतारोही दलों के सदस्य रहे थे, सफलता मिली तो हिलेरी के साथ। 29 मई1951 को सुबह 11.30 बजे 29000 फ़ीट के बेस केम्प से लगभग 40 मीटर की ऊंचाई पर एवरेस्ट की चोटी दो पर्वतारोहियों का इंतज़ार कर रही थी। अंततः एवरेस्ट पर मानव ने पैर रख कर अपने इरादे का सर्वोच्च शिखर को भी आयाम दिया। अब तो बिना ऑक्सीजन के हज़ारो पर्वतारोही एवरेस्ट को छू रहे है लेकिन पहले का नाम सभी को याद होता है। तेनज़िंग नॉर्क़े

29 May 2021 05:36AM,
by: Vikash Kumar