विचार

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अब के जमाने मे हिंदी लेखन उतना ही कठिन होते जा रहा है जितना पढ़ना क्योकि पढ़ने वाले पाठक की पठन भाषा युग के साथ बदल गयी है । क्रॉस वर्ल्ड नाम की किताब दुकानें आपके शहर अगर हो( मध्यम आबादी के नगरों में तो मुनासिब नही है) तो हिंदी में लिखी किताबे एक कोने में उंगलियों में गिनने लायक होती है, खैर ऐसे में अब अनुवाद ही जरिया बचा है हिंदी के लब्धप्रतिष्ठित लेखकों को याद रखे जाने का। मैं फिलहाल इस पचड़े में नही पड़ना चाहता क्योकि मैं अपने युग मे बड़ा हुआ हूं तो मुझे मेरे काल के लोगो से ज्यादा वास्ता है। ऐसा ही वास्ता नरेंद्र कोहली जी से भी था। यद्यपि मैंने कोहली जी को उतना नहीं पढ़ा है जितना उनको पढ़ना शेष है फिर भी पूत के पावँ पलने औऱ लेखक के हाथ उसके शैली, संरचना,और भाषाई अधिकार के साथ साथ विषय पर पकड़ से दिख जाता है। जाना नरेंद्र कोहली का...

18 Apr 2021 02:35PM,
by: Babuaa Desk
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हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाते हैं इसके माध्यम से हमारा लक्ष्य रहता है महिलाओं को सशक्त और सुदृढ़ बनाना। महिलाओं को उनके पूरे शक्ति और मानव अधिकारों के भरपूर इस्तेमाल करने की आजादी देना, ताकि वे जो हैं हो सकें। जिसका वे हकदार हैं वे भी पुरुषों की भांति सब कुछ सरलता से हासिल कर सकें। इन लक्ष्यों और वकलतों को पढ़कर, जानकर और सुनकर हमारे जेहन में एक प्रश्न उठता है कि "हमें महिलाओं को सशक्त और सुदृढ़ करने की वकालत करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?" जबकि भारतीय संविधान ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार कानूनों के माध्यम से भी महिला और पुरुषों को बराबर का अधिकार और अवसर उपलब्ध कराने के लिए सरकार को जिम्मेदारी दी गई है। ऐसा इसलिए क्योंकि विगत हजारों साल से हमने जिस पुरूष प्रधान समाज की मानसिकता से ग्रसित होकर महिलाओं के लिए अमानवीय रवैया अपना लिया है पुरुष को महिलाओं से श्रेष्ठ, महान और अधिक शक्तिशाली होने का कपोल कल्पित आइकॉन बना रखा है। पल-प्रतिपल महिलाओं को कमजोर प्रमाणित करने के लिए झूठे धार्मिक सिद्धांत, आधारहीन पारंपरिक नियम और पुरुषों के कुटिल बौद्धिक क्षमताओं के प्रयोग से श्रृंगार के नाम पर, सुंदरता, कोमलता और मर्यादा के नाम पर छला जाता रहा है। ये छलावा आज इतने हजारों साल बाद भी निरंतर जारी है.. कुछ कथित काल्पनिक धार्मिक सामाजिक सिद्धांतों की बात करें तो इसके आधार पर महिलाओं को हमेशा सुरक्षा की आवश्यकता होती है, उन्हें सृष्टि के संचालन के लिए संतानोत्पत्ति तथा कुल परिवार और पति के सेवा के लिए श्रमिक से अधिक कोई भी अधिकार देने के पक्ष में नहीं है, तरह तरह के व्रत उपवास के माध्यम से उन्हें जहां मानसिक रूप से शांत और संतुलित रहने की सीख दी जाती रही है वहीं उन्हें तरह तरह के आइडियाज के माध्यम से कोमल और सुंदर रहने के लिए प्रेरित किया जाता है। महिलाओं के लिए केवल कर्तव्य निर्धारित कर बांध रखा गया है जबकि पुरुषों को अधिकार सम्पन्न बनाया गया है। पुरुषों को आज भी केवल महिलाओं पर राज करने के लिए शक्तिशाली बने रहने की शिक्षा दी जा रही है, तरह तरह के कठोर शब्दभेदी बाण के माध्यम से पुरूषार्थ की मानसिकता बनाकर पुरुषों को कठोर और क्रूर बनने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

09 Mar 2021 02:44AM,
by: Babuaa Desk
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धान का कटोरा कहे जानेवाले राज्य के श्रम से निकले धान के मामले में दिल्ली सरकार को संवेदनशील होने की सख्त जरूरत है। छतीसगढ़ से किसानों की उपज का 40 लाख मेट्रिक टन चाँवल दिल्ली की सरकार को लेने का निर्णय उनका अपना निर्णय है ।राज्य की सरकार तो महज प्रतिनिधि बन कर अपना दायित्व निभा रही है। 2500 रु में किसानों से प्रति क्विंटल धान खरीदने के निर्णय ने भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका अदा की है। वे प्रयासरत है। एक माह पूरे होने को जा रहे है इसके बावजूद भारत सरकार से उनके हिस्से का ही धान मिलिंग के लिए अनुमति न मिलना किसानों के श्रम का अवमूल्यन ही है। किसान का मान राजनीति से परे हो।

28 Dec 2020 05:46AM,
by: Ashna Ali