विचार

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यूक्रेन पर रूस के हमले को समझने के लिए थोड़ा इतिहास में झांकने की आवश्यकता है। शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका ने 4 अप्रैल 1949 को उत्तरी अटलाण्टिक सन्धि संगठन (अंग्रेज़ी: North Atlantic Treaty Organization, NATO ; देवनागरी: नॉर्थ ऍटलाण्टिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन, नाटो ) नामक एक सैन्य गुट का गठन किया था, जिस पर १२ देशों- फ्रांस, बेल्जियम, लक्जमर्ग, ब्रिटेन, नीदरलैंड, कनाडा, डेनमार्क, आइसलैण्ड, इटली, नार्वे, पुर्तगाल और संयुक्त राज्य अमेरिका, ने हस्ताक्षर किए थे। संगठन में एक सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था के तहत सदस्य राज्य के बीच बाहरी आक्रमण की स्थिति में सहयोग करने के लिए सहमती बनाई गई। इसका मुख्यालय आज भी ब्रुसेल्स (बेल्जियम) में स्तिथ है। नाटो के प्रत्युत्तर में सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्वी यूरोप के देशों- पोलैंड, पूर्वी जर्मनी, चैकोस्लोवाकिया, हंगरी, रोमानिया और बुल्गारिया, के गुट ने सन् 1955 में वारसा संधि का गठन किया। इसका मुख्य काम था -नाटो में शामिल देशों का यूरोप में मुकाबला करना। युक्रेन में रूसी हमले का सवाल

01 Mar 2022 07:54AM,
by: Naveen kumar sahu
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आकाशवाणी, दूरदर्शन जैसे माध्यमो को सरकार के नियंत्रण में रहकर बोलने दिखाने के कार्यक्रम को अस्सी औऱ अब के दशक में देश देख सुन चुका था और अब फिर से देख सुन रहा हैं। अंग्रेजों के द्वारा विभाजन करो और राज करो का फार्मूला जिन्हें लगाना है वे सफल हो रहे है लेकिन दुख की बात है कि लोकतंत्र का चौथा खम्बा सत्तारूढ़ दलो के रंग में रंगते जा रहा है। इसका फायदा भले ही राजनैतिक दलों को मिल रहा है लेकिन नुकसान आम जनता को हो रहा है। किसी जमाने मे पत्रकारिता भी चिकित्सा के समान मानव सेवा हुआ करती थी। आम जनता के हित औऱ मनोरंजन के मुद्दे पाठकों को संतोष देते थे। जब किसी मिशन में व्यवसायिकता अपने पांव मजबूत करने लगती है तो निःस्वार्थ शब्द से निः विलोपित होने लगता है। चिकित्सा में व्यवसायीकरण ने अपना आधिपत्य जमा लिया है मानव सेवा की भावना अब कम हो गयी है । मल्टीप्लेक्स अस्पतालों के आने से चिकित्सा व्यवस्था अब शानदार व्यवसाय बन गया है। मरीज अब मुर्गे में बदल गया है।कितना काटा जा सकता है ये मायने रखता है। इलेक्ट्रॉनिक औऱ प्रिंट मीडिया का भी व्यवसायीकरण हो गया है। आजकल मीडिया हाउस हुआ करते है । ये समाज सेवा के लिए आये है ये कहना कठिन से हो चला है। जब हित मानव सेवा से परे जाकर लाभ हानि के बेलेंस शीट में परिवर्तित हो जाये तो स्वार्थ प्रथम हो जाता है। क्या कवि भी किसी मीडिया हाउस की संपत्ति होते है?

18 Dec 2021 06:03AM,
by: Naveen kumar sahu
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आज एक ऐसे व्यक्ति के जन्म दिन का शतकीय तिथि है जिन्होंने इस देश मे सहकारिता के आंदोलन का एक ऐसा मील का पत्थर गाड़ा जिसके सफलता के किस्से न केवल देश मे बल्कि विदेशों में सुनाये जाते है। भारत को कामधेनु गाय का देश माना जाता है।यहां आशीर्वाद में दूधो नहाओ पूतो फलों का आशीर्वचन दिया जाता है। कोई ऐसा घर न पहले था न अब है जहां सुबह की शुरुवात के लिए दूध की जरूरत न होती हो। दूध के अलावा दही,मठा, मक्खन,घी खोवा पुराने जमाने के सह उत्पाद रहे है। आज के दौर में पनीर और चीज़ के रूप में दूध के नए उत्पाद जुड़ गए है। वर्गीज कुरियन जो मूलतः शिक्षा मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पूरी किये थे लेकिन प्रबंधन उनकी ऐसी पसंदगी थी जिसे उन्होंने अमली जामा पहनाया दूध के सहकारी एकत्रीकरण से। भारत के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के हौसले अफजाई के चले कालीकट से वर्गीज़ खेड़ा( गुजरात) पहुँचे। असंगठित दूध उत्पादन के क्षेत्र को उन्होंने संगठित क्षेत्र में बदलने के लिए जो मेहनत उन्होंने की वैसा विरला व्यक्ति ही कर पाता है। दूध उत्पादन के लिए उन्होंने गाय के साथ साथ भैस को भी प्रमुखता देने का कार्य शुरू किया। दूध को ज्यादा समय तक सुरक्षित रखने के लिए प्रशीतन केंद्रों की स्थापना के साथ गाय भैस की प्रजातियों को उन्नत बनाने के लिए उनके पालन पोषण का वैज्ञानिक आधार का चयन किया गया। पशु चिकित्सा को दूध के उत्पादन में व्रद्धि के लिए जोड़ा गया। दो दशक की अवधि में वर्गीज़ कुरियन ने देश मे दूध उत्पादन का वह रिकार्ड कायम किया कि दुनियां में भारत चौथे क्रम पर आ गया। जिस देश मे दूध पाउडर विदेशों से आता था उसमें देश आत्मनिर्भर हो गया ये ठीक वैसी ही बड़ी उपलब्धि थी जैसे स्वामीनाथन जी ने कृषि के क्षेत्र में क्रांति की थी। स्वामीनाथन की क्रांति" हरित क्रांति" कहलाई तो कुरियन की क्रांति "सफेद क्रांति" कहलाई। अमूल कुरियन का साकार सपना था जिसे उन्होंने खुली आँखों से देखा था।  वर्गीज कुरियन: आखिर किस मापदंड से आप उन्हें चुनेंगे भारत रत्न

26 Nov 2021 04:26PM,
by: Naveen kumar sahu
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भारत की पहली बोलती फ़िल्म आलमआरा थी। इस फिल्म में एक कलाकार थे- पृथ्वीराज कपूर। आगे चलकर उनका खानदान फिल्म इंडस्ट्री का सबसे बड़ा सफल खानदान बना । चार पीढ़ी तक दादा से लेकर परपोता परपोती तक कलाकार सफलता के झंडे गाड़ रहे है। पृथ्वीराज कपूर बहुत ही ईमानदार कलाकार थे। अभिनय के प्रति उनका समर्पण अद्भुत था। वे न केवल पर्दे बल्कि रंगमंच के भी समर्पित कलाकार थे। भारत मे इप्टा नाट्य संस्था के वे संस्थापक सदस्य रहे। रंगमंच औऱ फिल्म में सबसे बड़ा अंतर ये है कि रंगमंच में आपको एक ही बार मे ही अभिनय करने की गुंजाइश रहती है।फिल्म में जब तक सर्वश्रेष्ठ नही आ जाता तब तक टेक रीटेक चलते रहता है। पृथ्वीराज कपूर ने पृथ्वी थियेटर की स्थापना की औऱ देश भर में लगभग 2500 बार नाटकों का मंचन किया। पृथ्वीराज कपूर को देश के पुराने दर्शक मुगले आज़म में जहाँगीर के पिता अकबर की भूमिका के कारण जाना जाता है।" प्यार किया तो डरना क्या" गीत में पृथ्वीराज कपूर ने मधुबाला औऱ दिलीप कुमार को फीका कर दिया था। अपनी बुलंद आवाज़ औऱ कदकाठी के कारण पृथ्वीराज अपनी अलग छाप छोड़े थे। उनके रहते रहते उनके सबसे बड़े पुत्र राजकपूर नायक औऱ निर्देशक के रूप में स्थापित हो गए थे। उनके दो औऱ पुत्र शम्मी कपूर और शशि कपूर भी फिल्म इंडस्ट्री में अपना मकाम बना लिए। आगे राजकपूर के पुत्र रणधीर कपूर और ऋषि कपूर भी फिल्म में आगे नक़्शे कदम पर चले। पृथ्वीराज कपूर ने अपने पुत्र राजकपूर और रणधीर कपूर के साथ" कल आज औऱ कल" में काम किया। किसी भी एक खानदान के तीन पीढ़ी के कलाकारों का एक ही फिल्म में काम करनें की अनोखी प्रस्तुति थी।  पृथ्वीराज कपूर होने का अर्थ

03 Nov 2021 01:36PM,
by: Naveen kumar sahu
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देश के पहाड़ो,जंगलो में अभावों के बावजूद सदियों से जीने वाले आदिवासियों को आदिवासी इसीलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपनी संस्कृति नहीं छोड़ी,अपनी परंपराओ को जीवित रखा, अपनी प्रथाओं को आत्मसात किये रहे। उन्हें शहरो की चकाचौंध ने पलायन के लिए मजबूर नही किया। वे घने जंगलों में प्राकृतिक संसाधनों से अपनी आजीविका चलाते रहे, उन्हें धन पिपासा कभी नही रही। यही वजह है कि वे कम संसाधनों में भी खुश रहते है अभाव उन्हें सालती नही है। यही वजह है कि वे गीत गाते है, स्वनिर्मित वाद्य यंत्र बजाते है, अपने पूर्वजो और अपने बनाये लय ताल पर थिरकते है,। उनके जीवन मे गीत, संगीत और नृत्य का विशेष महत्व है बेमिसाल राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव

01 Nov 2021 04:16PM,
by: Naveen kumar sahu