विचार

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क्या राजीव गांधी खेल रत्न के नाम परिवर्तन कर ध्यानचंद खेल रत्न नाम करना ध्यानचंद को भारत रत्न न देने की साज़िश है? ये बात जेहन में बहुत दिनों से घूम रही है क्योकि पहले तो यदि किसी व्यक्ति के नाम पर कोई पुरस्कार योजना चल रही है तो पहले तो उस नाम को चलने देने में कोई आपत्ति नही होना चाहिए। हर देश मे राजनैतिक दलों ने ये आज़ादी ली हुई है कि उनके सत्ता काल मे वे अपने सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व को याद रखने के लिए योजनाये बनाएंगे, सड़क, ओवरब्रिज , नहर, पुल, बांध, भव्य इमारत, अस्पताल,हवाई अड्डा, बनाएंगे तो उनके नाम का करण करेंगे। देश मे दलो की राजनीति चलती रहती है परिवर्तन भी होता है जिसके कारण विचार भी नए आते है। फिलहाल देश मे गुलामी को याद दिलाने वाले ऐसे बहुत से स्थानों के नाम परिवर्तन को हम देख रहे है। अच्छा है गुलाम मानसिकता से निजात मिलना चाहिए और देश को उन व्यक्तियों को याद रखने और सम्मान देने के लिए इतिहास को खंगालना चाहिए जिन्हें भले ही देश को गुलाम रखनेवालों ने आतंकवादी माना या उनके नामो को विस्मृत कराने की साज़िश रची। उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी माना जाना चाहिए और वे लोग जो गुलामी के दौर मे कला सहित अन्य क्षेत्र में विभूति रहे उनको सम्मान देने की स्वस्थ परंपरा बननी चाहिए। "ध्यानचंद भारतरत्न" क्यो नहीं...?

29 Aug 2021 12:15PM,
by: Babuaa Desk
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संस्कृति हमेशा परस्पर सद्भाव औऱ स्नेह के साथ सम्मान को भी सदियों से हर धर्म को सिखाते आ रहा है।इस सीख में चाहे माता-पिता हो या अम्मी- अब्बू या मदर- फादर इनके संतानों के बीच रक्त संबंधों के चलते बहन भाई का रिश्ता पवित्र रिश्तों में सबसे अहम रिश्ता है। इस रिश्ते को बंधन से बांधने की परंपरा पता नही कब से अनवरत जारी है लेकिन सावन के पूर्णिमा के दिन देश मे रंग बिरंगी राखी अमूमन हर कलाई में सजी दिखती है। त्यौहारों के देश मे रंगों की छटा केवल होली में नही बल्कि राखी में भी देखने को मिलती है। बाजार में न जाने कितनी विविधता के साथ रक्षा सूत्र निखरी रहती है। जो मन को स्नेह से बांधे वह भाई

22 Aug 2021 06:10AM,
by: Babuaa Desk
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दोयम दर्जे की मानसिकता पर न्यायपालिका का प्रहार
 एक समय सुना करते थे कि समाज मातृसत्तात्मक हुआ करता था। पुरुष  शारीरिक श्रम करता था और महिला  नीतिगत निर्णय किया करती थी। सम्भवः महिला जो कि घर को एक रखने की संगठनात्मक शक्ति रखती है वह कदाचित कारणों से एक दायरे में घिरते गयी और  श्रम के मामले में कंधे से कंधा मिलाकर न चलने की मनोदशा ने उसे बराबर का नही रहने दिया। पुरुष सत्तात्मक समाज बनते बनते महिलाएं वहां तक पिछड़ी जहाँ से उसे सम्मान,चरित्र, लिंग भेद के आड़ में घर और पर्दे के भीतर करने की बेहतरीन साज़िश सफल भी हो गयी।
 इसी परिवेश में रहते रहते उन्ही महिलाओ में से कुछ ने साहस दिखाया,विपरीत परिस्थितियों में वे संघर्ष के राह पर चली,देश दुनियां में उन क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जहां ये माना जाता था कि महिला वर्जित है।  वर्जनाओं को तोड़ना ही इस दुनियां में स्वयं के सामर्थ्य को स्थापित करना है और दूसरों को प्रेरित करने का बेमिसाल माध्यम है। कल  उच्चतम न्यायालय ने   बेटियो के लगाए गए समानता के अधिकार के हनन का मामले राष्ट्रीय सुरक्षा संस्थान  के लिए  होने वाली परीक्षा में लड़कियों को शामिल न करने के मामले में बड़ा अहम निर्णय दिया। संघ लोक सेवा आयोग को राष्ट्रीय सुरक्षा संस्थान(NDA) परीक्षा  में लड़कियों को भी शामिल करने का आदेश दिया है। केंद्र शासन जो  महिलाओ  को पुरुष के बराबर अधिकार देने के नाम पर  तथाकथित गाल बजाता है उसके दोयम दर्जे का व्यवहार भी उच्चतम न्यायालय के साथ साथ देश के सामने में भी सार्वजनिक हुआ जब उनकी तरफ से  तमाम पैरवी इस बात  किया कि सुरक्षा  व्यवस्था में वे कमीशन आधार पर चयन कर रहे है,साथ ही लिंग के कारण होने वाले परेशानियों का भी जिक्र किया, केंद्र शासन इजरायल के कमांडो  की सार्वजनिक खुलासा करते थकता नही है लेकिन ये भूल जाता है कि इजरायल की महिला कमांडो  कैसी सक्षमता रखते है।  इस आधार पर लड़कियों को अब तक NDA प्रवेश परीक्षा  में शामिल न करने की पैरवी पर की।
 सबसे अच्छी बात ये रही कि उच्चतम न्यायालय ने साहसिक निर्णय में केंद्र को असमता का पक्षधर मानने पर भौ टेढ़ी की। भौ टेढ़ी करना महिलाओके नाराज़गी  के भाव प्रदर्शन का नायाब तरीका है।
  मायने रखने वाली बात ये भी है कि महिलाओं को संविधान में समानता के अधिकार के अनुच्छेद 14,15,16 औऱ 19 के लिए लड़ने वाले कुश कालरा है।
 बेटियो के लिए बेटे भी लड़ते है।
अब बेटियो को भी जोश,जुनून, दिखाने के लिए  प्रवेश परीक्षा का रास्ता खुल गया है। इस साल परीक्षा दीजिये और चयनित होकर बनिये सेकंड लेफ्टिनेंट।
चलो आसमान छूने। शाबाश बेटियों!

20 Aug 2021 08:03AM,
by: Babuaa Desk
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हर व्यक्ति के बचपन से लेकर जवानी औऱ आगे के जीवन मे कुछ लोग बड़े ही आदरणीय होते है,विशिष्ट होते है।ऐसे लोगो का संघर्ष, त्याग देखकर यकीन नही होता कि ईश्वर ऐसे लोगो को भी सृजित करता है। राजनीति मेरा क्षेत्र नहीं है। मैं किसी भी दलगत राजनीति का हिस्सेदार नहीं हूं लेकिन कोई भी सजग व्यक्ति राजनीति से सरोकार रखने वालों के आदर्श से परे नही हो सकता है। इस लेख को पढ़ कर ये आंकलन न हो कि अटल जी का प्रशंसक होने का अर्थ कुछ और भी है।अटल जी विरोध और समर्थन दोनो के समवेत स्वर थे। उन्हें जो अच्छा लगा उसे अच्छा कहा बुरा लगा सो बुरा कहा। वे मतभेद को स्वीकारने औऱ मनभेद से दूर रहने वाले व्यक्ति थे। इंडिया से भारत और भारत से हिंदुस्तान का सपना उनका अपना था जिसके लिए वे संघर्ष की पराकाष्ठा तक गए। सफल हुए। देश मे अनेक सुभीता औऱ सुविधा के प्रधानमंत्री बने लेकिन अटल जी जुदा थे। उनकी लोकप्रियता का मुकाबला न तो नेहरू न इंदिरा गांधी न ही राजीव गांधी और न ही नरेंद्र मोदी कर पाएंगे क्योकि वे अल्पमत के बहुमत थे। उनकी सृजन शीलता उन्हें राजनैतिक व्यक्तित्व से कही ज्यादा एक संवेदनशील व्यक्ति बनाती थी। वाकपटुता ऐसी कि लगता उनको बस सुनते रहो। मेरे अटलबिहारी

16 Aug 2021 05:52AM,
by: Babuaa Desk
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जात न पूछो साधु की,ये बात कह कर विद्धवान व्यक्तियों की पूछ परख का संदेश इस दुनियां को देनेवाले महान विचारक का आज जन्मदिन है। भक्तिकाल के दौर में कबीर ने तब के दौर में आज की सार्थक बात कहनेवाले कबीर ने जुलाहे के समान अलनी विचारों की ऐसी चादर बनाई जिसे जिसने ओढ़ा वह समझदार ही बना। कबीर ने अपनी बातों को कहने के लिए दो पंक्तियों को साझा करते रहे।ऐसी भाषा का उपयोग किया कि जो साधारण व्यक्ति को व्यवहारिक रूप से जीवन के मर्म को समझा सके, इसी कारण कबीर, तुलसीदास के समान ही सरल रहे,सहज रहे। उनके प्रचलित दोहे तो आज भी लोगो के जुबान पर है लेकिन कदाचित उनके बेहतरीन विचारपरक दोहे जिन्हें पढ़ने सुनने को कम मिलते है आज उनसे रूबरू होने का भी दिन मान लेते है कबीर, निर्भीक विचार के आधार स्तम्भ

24 Jun 2021 04:46AM,
by: Babuaa Desk
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 कलम के धनी भारतीय लोग जिन्होंने आंग्ल भाषा मे अपने कलम के अधिकार को प्रमाणित किया उनमें से एक नाम विक्रम सेठ का भी है। अक्सर ये माना जाता है कि उपन्यास पढ़ने से ज्यादा लिखना कठिन है।उपन्यास में चरित्र के साथ साथ घटना क्रम को विस्तार देने की बाध्यता होती है। विक्रम सेठ उपन्यासकार होने के अलावा कवि भी है। देश विदेश में माना जाता है कि भारत मे कथानकों की भरमार है लेकिन हिंदी औऱ क्षेत्रीय भाषा में लेखन हमे अंतरास्ट्रीय स्तर पर स्थापित नही होने देती है इसके लिए अंग्रेजी भाषा ही एकमात्र भाषा है जिसका ज्ञान होने पर आप विश्व विख्यात हो सकते है। विक्रम सेठ ने ये रास्ता अख्तियार किया औऱ 1349 पृष्ठ का उपन्यास A suitable boy की रचना कर डाली। ये उपन्यास भारतीय परिवेश में एक विवाह योग्य युवती के परंपरागत विवाह के लिए एक योग्य लड़के की तलाश और खुद युवती के द्वारा चयन के बीच की गुत्थमगुत्थी है। देश विभाजन के बाद सम्प्रदायवाद के परिवेश में इस उपन्यास का कथानक आगे बढ़ती है।अंत क्या होता है? ये जानने के लिए आपको अ सूटेबल बॉय पढ़ने की सलाह है। विक्रम सेठ ने द गोल्डन गेट , एन इक्वल म्यूजिक, जैसे अविस्मरणीय उपन्यास लिखे जिसके कारण उन्हें सारी दुनियां में दमदार लेखक माना जाता है। उपन्यास के अलावा वे कविता धर्मी भी है। मैपिंग, आर यू हू स्लीप एट नाईट, थ्री चाइनीस पोएट्स, उनकी उत्कृष्ट कविताओं का संकलन है।बैस्टली टेल्स फ्रॉम हेयर एंड देयर, बच्चों के लिए 10 कहानियों का संकलन है। जो ये प्रमाणित करता है कि विक्रम सेठ के मन मे बाल मन भी छुपा हुआ है विक्रम सेठ - "ए सूटेबल बॉय"

21 Jun 2021 02:06AM,
by: Babuaa Desk