विचार

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राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार सर्वाधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार है। इसमें भी उत्कृष्ट पुरस्कार की बात करे तो दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की कीमत सबसे अधिक है। ये पुरस्कार बिना किसी लाग लपेट के सादगी लेकिन सम्मानीय ढंग से दिया जाता है। ये किसोइ भी शराब के आड़ में सोडा, अथवा गुटखे की आड़ में जर्दा अथवा छद्म खूबसूरती बेचने वाले कास्मेटिक कम्पनी के द्वारा प्रायोजित नही होता है। एकात बार शर्मिला टैगोर के सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष रहने के दौरान 2004 में हम तुम जैसी फ्लाप फिल्म "हम तुम" को छोड़कर अमूमन ये पुरस्कार प्रतिष्ठा को बढ़ाया ही है। इस साल ये पुरस्कार जिस सख्सियत को मिला है वे पश्चिम के मराठी मानुस होकर दक्षिण में एक बस कंडक्टर से अद्भुत भूमिका करनेवाले रजनीकांत को मिला है। वे हिंदी भाषी फिल्म कलाकार शत्रुघ्न सिन्हा के समान ही दक्षिण के सफल कलाकार रहे है जिन्होंने खलनायक होने की सफलता के बाद खल छोड़ नायक बने।दक्षिण में रजनीकांत की लोकप्रियता आपको आश्चर्य में डाल सकती है क्योंकि हिंदी फिल्मों के नायकों के महंगे होने से पहले रजनीकांत ही करोड़ रुपये पाने वाले पहले नायक हुए थे। उनकी प्रतिभा भी निराली रही है। विस्मयकारी तरीको से उनका नायकत्व निखरता था। उन्होंने बॉलीवुड के चॉकलेटी नायकों के पलट सामान्य चेहरे से अपनी अलग दुनियां बनाई। उनके मनोरंजन की दुनिया के प्रति सालो के समर्पण के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया है।  दादा साहब, रजनीकांत

26 Oct 2021 08:08AM,
by: Naveen kumar sahu
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एक देश के दो टुकड़े करने वाले तो अब इस दुनियां में जिंदा नहीं बचे है लेकिन उनके दोगले कार्यप्रणाली ने दो देशों के बीच वैमनस्यता की इतनी बड़ी खाई खोद दी है कि दोनों देश के लोग गीता और कुरान पर हाथ रख कर भी कसम खा ले तो भी विश्वास में कोई अविश्वास का तड़का बचा रह जाता है। एक सीमा के दो छोर पर दोनो देशो में से उधर की खूबी ये है कि वे सच्चे राष्ट्रवादी है, धर्मपरायण है,गद्दार नही है। ईमानदारी से हारे या जीते मातम औऱ जश्न खुलकर मचाते है। देश का झंडा लेकर अपने देशभक्त होने का प्रमाण पूरी दुनियां में देते है। ऐसे सच्चे राष्ट्रवादी,धर्मपरायण, लोगो को पसंद किया जाना चाहिए। अब बात दूसरी तरफ की भी हो जाये।सही मायने में हमारे देश मे न तो राष्ट्रीयता में ईमानदारी है और न ही धर्मपरायणता है। इस देश मे राष्ट्र विरोधी भी है और धर्म विरोधी भी ,सम्प्रदाय विरोधी तो लोग है संस्था है दल है। हमे गर्व से भारतीय कहने में दर्द होता है। 1947 को याद कर जख्म पर मलहम की जगह नमक डाला जाता है। देश के सीमा के भीतर देश मे रहने वाले लोग ही ऐसा वातावरण बना के रखे है कि उनके देशभक्त न होने के सबूत मिलते है। आपने बीते 74 सालों में कभी ये खबर पढ़ा है कि पाकिस्तान में रामराज्य परिषद या किसी कट्टरवादी संस्था( ठाकरे जी की शिवसेना) ने पाकिस्तान के किसी हिस्से में बम विस्फोट किया है,? किसी को उसी के देश मे शरणार्थी बनाया है? ये जरूर सुना पढ़ा होगा कि अपने ही देश मे हरिसिंह द्वारा मांगे गए शरणागत के बाद से आजतक कश्मीर में खून के छीटे सड़को पर सुर्ख होते गए। हमारे संरक्षको ने मौन तमाशा देखा है जिसके चलते अपने ही देश मे लोग सालो से शरणार्थी बने हुए है। अब ऐसे लोग जब क्रिकेट की जंग में देश के सामने पाकिस्तान को देखते है वे सिर्फ जीत और जीत ही चाहते है। ये जीत उनके जख्म को मल्हम लगाता है। यही जीत दोगले लोगो के गले से नीचे नही उतरती है जो खाते यहां का है और गाते वहां का है। ये वही लोग है जिन्होंने सालो पहले भारतीय हॉकी टीम के हारने पर जश्न औऱ हारने पर मातम पीटा था। क्रिकेट में भी सालो से बंद रिश्ते की शुरुआत हुई थी तो इस खेल में भी यही हाल था। क्रिकेट को सट्टा में बदलने वाला औऱ कोई नही दाऊद इब्राहिम ही था। अजहर को कप्तान भारत का बनाया गया था लेकिन जब आरोप प्रमाणित होते दिखा तो वे साम्प्रदायिक हो गए। ऐसे में खेल नही होता है जंग होता है भले ही खिलाड़ी बेट लेकर जाते है लेकिन वह तलवार होती है ।फेंकी जाने वाली बाल सेनिको के गर्दन हुआ करती है। मैदान में कप्तान नही कमांडर इन चीफ उतरते है। टीम नही सेना उतरती है। खेल के बहाने जंग

24 Oct 2021 10:53AM,
by: Naveen kumar sahu
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ईश्वर कैसा रहा होगा? ये प्रश्न मुझे हमेशा एक अंतहीन विचार यात्रा में लेकर सालो से लेकर चलाता आ रहा है। देखने की शक्ति हमे सबसे पहले मिलती है सो छिंदवाड़ा के दुर्गामंदिर में पहली बार दुर्गा को देखा था। वे आठ हाथ वाली थी। आते जाते उनको देखता तो लगता कि इनके आठ हाथ क्यो है? हमारे तो दो ही हाथ है। सात हाथो में अस्त्र शस्त्र सहित अन्य औऱ एक हाथ मे आशीर्वाद की भंगिमा , मन मे विचार आता कि ईश्वर को चार गुना सामर्थ्य रखना पड़ता होगा। दुर्गा मंदिर के थोड़ी दूरी पर राम मंदिर था। भव्य, चार गुम्बजों वाले इस मंदिर के मध्य में राम सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां थी। सभी लोग इस मंदिर को राम मंदिर कहते थे। मैं विचार करता कि दुर्गा मंदिर में दुर्गा अकेली है तो ईश्वर है लेकिन राम सीता लक्ष्मण के साथ साथ मे होने के बावजूद ईश्वर केवल राम का क्यो है? क्या सीता औऱ लक्ष्मण ईश्वर क्यो नहीं है।झिझक हुआ करती थी मन मे सो ये प्रश्न अनुत्तरित ही रहे। उम्र के साथ मन्दिरो में अलावा जब पाठशाला में गया तो" ग" गणेश से प्रथमपूज्य ईश्वर से परिचय हुआ। कालांतर में ईश्वर के नाम के आधार शिव, विष्णु, कृष्ण,हनुमान,काली, मंदिरो में जाना हुआ।जिन ईश्वरो के मंदिर नही थे उन ईश्वरो के नाम से भी परिचय होते गए। हर ईश्वर के दिन भी ज्ञात होने लगे। इन सबके साथ लोगो के घरों में भी एक हिस्सा मंदिरो के रूप में दिखता। भक्ति दिखती,भक्त दिखते। त्यौहारों में ईश्वर के प्रति श्रद्धा को चरम में भी देखता।दिन विशेष में ईश्वर अन्य दिनों की तुलना में वरीयता प्राप्त करते। इतने के बावजूद मेरी ईश्वर के आकृति के लिए उलझन बढ़ते जा रही थी/है। ईश्वर निराकार है,ईश्वर हवा में है,कण कण में है, सर्वव्याप्त है।इन बातों ने मुझे हमेशा ही द्वंद में रखा। इन्ही काल मे ईश्वर के स्थापित विशेष नगरों जैसे प्रयागराज, बनारस, हरिद्वार,उज्जैन, मथुरा, द्वारका, तिरुपति,अयोध्या, सहित अन्य धार्मिक स्थलों में जाना हुआ। ये तो तय हुआ कि आस्था का चरम है। विश्वास की पराकाष्ठा है।कठिन परिस्थितियों में मनोवैज्ञानिक संबल है ईश्वर। जिससे डिगना असंभव है लेकिन मन एक प्रश्न अवश्य खड़ा करता कि ईश्वर का वास्तविक रूप क्या होगा। जनश्रुत के आधार पर कल्पना के चलते बने आकृति में क्या सचमुच ईश्वर अपने यथा रूप में है? आपसे उत्तर की अपेक्षा है। बताइएगा.. मन को मंदिर इसीलिए कहते है

18 Oct 2021 01:12PM,
by: Naveen kumar sahu
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समूचे भारत मे अपवादस्वरूप कुछ स्थानों को छोड़ दे तो अमूमन हर व्यक्ति आज रावण को मारने के लिए आतुर है। सुबह से व्हाट्सएप फेसबुक ट्विटर इंस्टाग्राम में सभी जाने अंजाने लोग दशहरा की।बधाई दे रहे है। बुराई पर अच्छाई की जीत के अधिकांश पूर्वनिर्मित संदेशों का प्रक्षेपण चल रहा है। सृजन का संसार छोटा है सो आगे बढ़ाओ, मुक्ति पाओ का सिद्धांत दौड़ रहा है। शाम होते तक चंदे के रावण मैदानों में खड़े होने वाले है। ऊंचाइयों का होड़ पिछले दो साल से कोरोना काल के चलते कम हो गयी है वरना देश का राज्य का, शहर का सबसे ऊंचा रावण आकार बढ़ाते ही जा रहा था। पहले कुछ स्थानों में रावण हुआ करते थे लेकिन समय बदल गया है। एक दो दस पंद्रह फुट के बौने,मध्यम रावण बाजार में खड़े है बिकने के लिए। इसके अलावा रावण के मामले में स्थानीयकरण का सिद्धांत भी लागू हो गया है। प्रतिष्ठा के प्रश्न के रूप में रावण खड़ा हो जाता है मारने वाले के अहम की संतुष्टि के लिए। हम सभी जानते है कि रावण को मारने का श्रेय दशरथ नंदन राम को जाता है।अपनी पत्नी के अपहरण का बदला लेना था। स्त्री प्रतिष्ठा का प्रश्न था पुरुष के सामने। रावण वध के बाद भी राम ने अग्नि परीक्षा ली थी समाज को दिखाने के लिए, सतीत्व की परीक्षा उतीर्ण होने के बाद भी राम कानाफूसी करने वाले समाज के कमजोर मानसिकता वाले व्यक्तियों के सामने हार गए थे। इस कारण आज हर कोई रावण मारने जाएगा लेकिन कोई भी राम बनने की प्रत्याशा लेकर नही जाए।राम के प्रतीक बने बड़े बच्चे या रावण दहन के मुख्य अतिथि बारूद से भरे बाण चलाएंगे या लेज़र से रावण का वध करेंगे लेकिन वे राम नही बनें। राम बनने के लिए त्याग करना पड़ता है ।त्याग हमारी मानसिकता में है ही नही। हम हमेशा अपेक्षा करते है । सदियों से दशहरा आ रहा है जा रहा है रावण के पुतले विशाल होते जा रहे है। रावण वध कार्यक्रम के बहाने स्वार्थ साधे जा रहे है। स्त्री पुरूष शामिलात रूप से सपरिवार जा रहे है। अपने भीतर बुराइयों को साथ लिए हुए। जाएंगे, दर्शक बनेंगे, रावण धुं धुं कर जलेगा,विस्फोट होगा, कुछ ही क्षणों में भरभरा कर गिर जायेगा। प्रसन्न हो जायेंगे। रास्ते मे सोन पत्ती खरीद लेंगे। घर पहुँचेंगे। घर मे तिलक अभिनंदन होगा। मिष्ठान नसीब होगा। प्रतीक स्वरूप धन राशि प्राप्त होगी। बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मन जाएगा। तो आज आप रावण मारने जा रहे है

15 Oct 2021 08:00AM,
by: Naveen kumar sahu
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देश मे 1969 का साल राजनेतिक घटनाक्रम के बदलते परिवेश के साल था।कांग्रेस में विभाजन के साथ साथ एक नई शक्ति के रूप में इंदिरा गांधी का शिखर की ओर बढ़ने की प्रक्रिया भी अग्रसर हो रही थी। इसी दौर में ख्वाजा अहमद अब्बास ने एक फिल्म बनाई थी- सात हिंदुस्तानी। इस फिल्म में प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन के पुत्र भी एक हिंदुस्तानी थे। फिल्म आयी चली गयी।आखिर सातवें हिंदुस्तानी जो थे। ये दौर नाराजगी का दौर था।गुस्सा हवाओ में घुल रहा था।इधर फिल्मों में समान्तर रोमांस के साथ साथ एक असफल नायक को लेकर अनेक कलाकारों के द्वारा छोड़ी गई फिल्म में अवसर दिया गया। नाम था इस फिल्म का जंजीर। नाराज युग के महानायक

11 Oct 2021 06:02AM,
by: Naveen kumar sahu
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   भारतीय सिनेमा के पुरुष दर्शकों के लिए नायिका सदैव एक विस्मित कर देने वाली तिलस्म ही रही है।शायद ये प्रकृति से जुड़े प्रश्न का भी उत्तर भी है कि विपरीत लिंग के प्रति स्वाभाविक आकर्षण होता है। इसी आकर्षण को लेकर जहां पुरुष दर्शको के दिलोदिमाग में अनेक नायिकाओं ने घर बनाया वही उनके वस्त्र- आभूषण सहित उनके अदायगी ने महिला दर्शको के भी मस्तिष्क में जगह घेरने का काम किया। यूं तो सिनेमा जगत में नायिकाओं का दौर सिनेमाई शुरुवात के साथ हो गया था । मधुबाला ने सौंदर्य मापदंड की पहली रेखा खिंची थी उनके बाद वैजंती माला, नूतन,शर्मिला टैगोर ,हेमा मालिनी, इस परंपरा की वाहक रही। हेमा मालिनी के साथ साथ फिल्ममें दक्षिण की नायिकाओं के प्रवेश की संभावना बढ़ने लगी। इधर फिल्म निर्माण की संख्या मे आशातीत वर्द्धि हुई। इसी दौर में एक नायिका दक्षिण से आई जो प्रसिद्ध नायक जेमनी गणेशन की बेटी थी- रेखा। लोग कहते है कि हाथो की रेखा है।

10 Oct 2021 12:55PM,
by: Naveen kumar sahu
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 साठ के दशक से लेकर कोरोना काल के पहले तक अगर गुरुवार(नब्बे के दशक तक) और अब शुक्रवार का कोई मतलब हुआ करता है तो सिनेमाघरों में लगने वाली फिल्में ही हुआ करती थी। शुक्रवार से लेकर रविवार तक ये माना जाता है कि केंद्रीय सरकार के सरकारी कर्मचारी अधिकृत रुप से अवकाश पर होते है। शनिवार से विद्यालय महाविद्यालय बन्द होने के बाद मनोरंजन के नाम पर फिल्मो में विचरना अनिवार्यता ही रही थी। कोरोना ने अब संदर्भ बदल दिए है, ओटीटी आने के बाद अब फिल्में भी 3×6 इंच के पर्दे में सिमट गया है। एक जमाने मे गानों के लिए जाने वाला दर्शक वर्ग खत्म होते जा रहा है।ढाई से लेकर तीन घण्टे वाली फिल्में अब नही बनती है। लेकिन आजादी के बाद ऐसा दौर आया था।श्वेत श्याम फिल्मों के दौर में अनेक नायक आये। पारिवारिक नायक रहे, प्रेमी नायक रहे लेकिन इन नायकों में एक नायक ऐसा भी आया जिसका चेहरा नायक सा नही था। सरकारी सेवा में थे वो भी पुलिस विभाग में, ऐसे ही सरकारी कर्मचारी का रुतबा आम आदमी से अलग होता है तिस पर पुलिस विभाग याने वर्दी का रौब, इसी वर्दी से निकल कर आये थे - 'राजकुमार' यहां के हम है 'राजकुमार'

08 Oct 2021 10:56AM,
by: Naveen kumar sahu