विचार

Generic placeholder image

रावण एक व्यक्ति नही विचारधारा है।आदिकाल से चल रही पुख्ता विचारधारा। अच्छाई होने के बावजूद बुराई को पोसने की विचारधारा। पंडित था रावण,पाण्डित्य से लबरेज, ज्ञान का भंडार, राज काज में माहिर, पुरोहिती का विलक्षण ज्ञानी लेकिन विस्तारवादिता का लोभ था ।शक्तिशाली दिखने के लिए उचित के साथ अनुचित कार्य के प्रति रावण की आसक्ति ही उसके देहांत का कारण बनी।घर मे अनेको पत्नियों के होते पर एक स्त्री जिसे जीत न सकने के अफसोस था उसके अपहरण का लोभ ये सिद्ध करता है कि जो पुरुष पर स्त्रियों के प्रति जुदा दृष्टिकोण रखता है उसके भीतर रावण वास करता है। आज के युग मे बढ़ते बलात्कार की घटना ये सिद्ध करते है कि रावण का मरना असंभव है। रावण मरते नही है

06 Oct 2021 11:57AM,
by: Babuaa Desk
Generic placeholder image

हमारे देश के पुरुषों की औसतन ऊँचाई पांच फुट पांच इंच हुआ करती थी अब कुछ इंच बढ़ गयी होगी लेकिन जब देश आजादी के बाद अपने संविधान निर्माण के बाद देश निर्माण की ओर अग्रसर हो रहा था तब पांच फुट पांच इंच के औसत कद वाले एक व्यक्ति को स्थाई सरकार के कर्णधार पंडित जवाहर लाल नेहरू के आकस्मिक निधन के बाद देश की सत्ता सम्हालने का मौका दिया गया। दरसअल नेहरू जी और सत्ता सम्हालने के लिए योग्य होने वाली इंदिरा गांधी के बीच के अंतराल में सत्तारूढ़ पार्टी के भीतरी कलह ने अवसर की राजनीति को जन्म दिया था। आवश्यकता इस बात की थी योग्य समय आने तक योग्य व्यक्ति को देश का दायित्व दिया जाए जो सही समय आने तक गद्दीनशीन रहे। तमाम दमदार लोगो के रहते सहज लाल बहादुर शास्त्री जी का चयन हो गया। वे सीधे इंसान थे इस कारण उनकी राजनीति भी सीधी थी। वे जानते थे कि विभाजन की त्रासदी को झेलना पड़ेगा और पड़ोसी देश कमजोर करने की कोशिश करेंगे। 1965 में पाकिस्तान के दोगलेपन को शास्त्री जी ने जय जवान के नारे से मुंहतोड़ जवाब दिया तो देश मे अकाल ओर खाधान्न की कमी ने जय किसान के नारे को सफल बनाया। वे हरित औऱ श्वेत क्रांति के जनक थे जिसे आगे चलकर स्वामीनाथन औऱ कुरियन ने पुख्ता किया। लाल बहादुर शास्त्री साधारण परिवार से आये थे सो वे आम आदमी की जरूरतों को करीबी से समझा करते थे। देश की अवसरवादिता की राजनीति ने उनको हटाने के लिए जो षडयंत्र रचा वह किसी से छुपा नही है। ताशकंद में उनकी मृत्यु से उपजे शक की प्रामाणिकता आज तक यक्ष प्रश्न की तरह खड़ा है। इस छोटे कद के विराट व्यक्ति को अवसर मिलना चाहिए था लेकिन नही मिला।आज ही के दिन इस देश के इस सहज नेतृत्व ने जन्म लिया था। उनकी जयंती पर अन्य का जन्मदिन मनता है इस कारण ये व्यक्ति नेपथ्य में चला जाता है। देश मे रंग लाल, तो लाल बहादुर शास्त्री से ही हैं। "वे लाल भी है, बहादुर भी औऱ शास्त्री भी"

02 Oct 2021 09:29AM,
by: Naveen kumar sahu
Generic placeholder image

मेरे जीवन के प्रारंभिक दौर देखी हुई एक फिल्म थी- आखरी खत, इस फिल्म के एक आवाज़ ने एक गीत गाया था जिसका मुखड़ा था - बहारों मेरा जीवन भी सवारों, इस गीत मेके अंतरे में एक पंक्ति थी- तुम्ही से दिल ने सीखा है धड़कना। 7 -8 की उम्र में स्वर, तो कवि-लेखक,गीतकार, गायक गायिका, संगीतकार की समझ नही थी फिर भी इस गीत की गायिका की आवाज़ बहुत बहुत बहुत अच्छी लगी थी। कालांतर में समझ के साथ जब रेडियो युग का दौर था तब जैसे ही गाना खत्म होता , रेडियो के पीछे झांक कर देखते गाने वाले कहां चले गए। इतने छोटे से रेडियो में ये गाने वाले घुसते कैसे है? - ये जिज्ञासा बचपन मे रही लेकिन माध्यमिक शिक्षा के दौरान भौतिक शास्त्र से पाला पड़ा और ध्वनि के अध्याय में माजरा समझ मे आया तो साथ मे सारी दुनियां को अपनी सुमधुर आवाज़ की स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर दीदी के आवाज़ से भी आत्मसात का दौर शुरू हुआ। अपने बच्चे होने से लेकर अपने बच्चों के बड़े होते और खुद को उम्र के उत्तरार्द्ध में आते तक शायद ही कोई दिन या रात गुजरी हो जब लता दीदी के किसी गाने को न सुना हो। सालो पहले एक अवसर हाथ से निकल गया था जब लता दीदी को साक्षात देखने और सुनने का मौका मिल सकता था।छत्तीसगढ़ के छत्तीस गढ़ो में खैरागढ में इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय में लता दीदी औऱ आशा दीदी दोनो एक कार्यक्रम में आये थे। सभी को लगा था कि लता दीदी जिन्होंने हज़ारो गाने गाये है उनमें से एक गाना सुना देंगी लेकिन अपने गायन में लता दीदी ने गायन परंपरा में अपने इष्ट भगवान का स्मरण कर भजन सुनाया तो उन्हें न देखने और न सुनने के बावजूद उनके प्रति आदर आराधना में बदल गया। वे मेरी आराध्य हो गयी। उनकी स्वर साधना की महज नौ साल से शुरू हुई थी और अनवरत ससत्तर वर्ष तक जारी रही। उम्र के अंतिम पड़ाव में जब दंत विन्यास अपना सामर्थ्य खोने लगते है, तब स्वर औऱ व्यंजन की सशक्तता भी क्षीण होने लगती है। आवाज़ में स्पष्टता का अभाव होने लगता है ये दौर भी हर व्यक्ति के जीवन मे आता है लता दीदी के जीवन मे भी आया। वे सक्रिय गायन से "तुमको ,तुम्ही से चुरा लूँ" के बाद लता दीदी फिल्मों के गीत से मौन साध लिया लेकिन स्वर साधना वैसी ही है जैसे आज से त्रियासी साल पहले था। लता दीदी, जिनकी आवाज़ ही पहचान है

28 Sep 2021 01:07PM,
by: Naveen kumar sahu
Generic placeholder image

फिल्म जगत आम भारतीयों के लिए एक ऐसा सपनो का संसार है जहां से हर व्यक्ति एक नायक नायिका की तरह से अपनी जिंदगी को रचाता बसाता है। पुरुषों में नायकत्व का असर बहुत होता है। वे अपने समय काल के नायकों का अनुशरण कर केश विन्यास रचते है, कपड़े पहनते है, भाव भंगिमाएं का अनुशरण करते है। इन्ही के माध्यम से अपने जीवन के नायिकाओं को प्रभावित करने का सफल असफल प्रयास भी नायकत्व का सशक्त पक्ष है। अवाक फिल्म राजा हरिश्चंद्र से लेकर सवाक फिल्म आलमआरा के बाद से 1947 तक के दौर में धार्मिक औऱ सामाजिक पृष्ठभूमि की फिल्मों में नायकत्व का दौर नही था। ईश्वर या सामाजिक परिवेश की भूमिकाओं में ही कलाकार जीते रहे लेकिन पहले नायक के रूप में अशोक कुमार, राजकपूर, दिलीपकुमार गुरुदत्त नही थे बल्कि देवानंद थे। वे रूमानी अभिनय के जादूगर थे जिनके चाहने वाले ही नही चाहने वाली भी थी। ब्लेक एन्ड व्हाइट से लेकर रंगीन फिल्मों के सफर में देवानंद हर प्रकार के अभिनय में जीते गए।"गाइड" उनकी बेमिसाल फिल्म के रूप में अंतरास्ट्रीय स्तर पर सराही गयी फिल्म थी। ये फिल्म दर्शनशास्त्र की फिल्म थी जिसमे आस्था के प्रश्न का बेमिसाल उत्तर था। उत्तरोत्तर देवानंद ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा औऱ इसमे भी वे बहुत अर्से तक स्वाद चखते रहे। अर्बन हीरो बनाम देवानंद

26 Sep 2021 06:58AM,
by: Naveen kumar sahu
Generic placeholder image

आम तौर पर अन्य खेलों की तरह टेनिस खेल में अनुभव की महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता है। पुरुषों में तो तीन चार अनुभवी के बीच मे ही पिछले दो दशक से प्रतिस्पर्धा जारी है। फेडरर,नडाल,जोकोविच ही अमूमन अंतिम चार में होते है। महिला जगत में सेरेना विलियम्स के युग के समाप्त होने के बाद फिलहाल कोई भी महिला खिलाड़ी का वर्चस्व नही बन पाया है।हर ग्रैंड स्लैम में नई विजेता खड़ी हो जाती है। एक का नाम ठीक से याद नही हो पाता है कि दूसरी विजेता बन जाती है। इस बार के अमेरिकी ओपन ग्रैंड स्लैम में तो दो किशोरियों का जादू चला। सालो बाद ऐसा हुआ कि दो किशोरियां अनुभवी खिलाड़ियों को नाकों चने चबाने के बाद आमने सामने हो गयी। एक कनाडा की सनसनी तो दूसरी ब्रिटेन की तूफान। दोनो के फाइनल में आमने सामने होने पर ये अंदाज़ा लगाया जाना कठिन था कि विजेता कौन बनेगा लेकिन सारे अनुमानों को धता बता कर 19वे साल में कदम रखने वाली एमा ने ब्रिटेन के लिए वर्जिनिया वेड के बाद 44 साल के अंतराल के बाद ग्रैंड स्लैम के रूप में अमेरिकी ओपन स्पर्धा के कप को अपने नाम कर लिया।एमा को मुख्य ड्रा में आने से पहले क़्वालिफाई राउंड खेलना पड़ा था। इसके बाद के अगले 7 दौर में एमा ने किसी भी खिलाड़ी को तीसरे सेट तक जाने नही दिया। फाइनल में कनाडा की सनसनी लेलाह को भी सीधे सेट में 6-4 6-3 से हरा कर 22 साल बाद दो टीनएज के फाइनल का रिप्ले किया। 1999 के अमेरिकी ओपन में ही सेरेना विलियम्स( 17 साल) ने मार्टिना हिंगिस(18 साल) को हराया था। टेनिस जगत में केवल 7 अवसर ऐसे आये है जिसमे फाइनल में पहुँचने वाले दोनो महिला खिलाडियो की उम्र टीन एज की थी। 1988 में स्टेफी ग्राफ(18) ने अमेरिकी ओपन में गैब्रिएला सबातीनी(18) और फ्रेंच ओपन में नतालिया जेरेजोवा (17) को 6-0,6-0 से हराया था। 1989 में साचेंज विकारियो(17) ने स्टेफी ग्राफ(19 ) को फ्रेंच ओपन में हराया था। 1991 के फ्रेंच ओपन में मोनिका सेलेश(17) ने साचेंज विकारियो(19) को पराजित किया था। 1997 के फ्रेंच ओपन में मजोली(19) ने मार्टीना हिंगिस(16) को हराया तो इसी साल के अमेरिकी ओपन में हिंगिस (16) ने वीनस विलियम्स(17) में हराया था। 1999 में ऑस्ट्रेलियन ओपन में हिंगिस(18) ने मौरेस्मो(19) औऱ इसी साल के अमेरीकी ओपन में सेरेना(17) ने हिंगिस(18) को हराकर दो टीन एज खिलाड़ियों के फाइनल का सफर तय किया था। इस कड़ी में इसी साल ड्राइविंग लाइसेंस पाने वाली दो खिलाड़ियों ने अपना नायाब खेल दिखाया है। एमा के बराबर ही लेलाह ने भी शानदार खेल दिखाया लेकिन वे उपविजेता ही बन पाई। उनके भी फाइनल तक का सफर अद्भुत ही था। दोनो खिलाड़ी समान रूप से बधाई के पात्र है। टेनिस में नई ताजगी - एमा औऱ लेलाह

15 Sep 2021 04:24PM,
by: Naveen kumar sahu
Generic placeholder image

बहुत साल पहले देश की भाषायी दुविधा को लेकर प्रेम विषयक फिल्म आयी थी- एक दूजे के लिए। इस फिल्म में हिंदी भाषी युवती रति अग्निहोत्री से एक तमिल भाषी युवक कमल हासन के देह से परे मन के प्रेम का दुखांत था। भाषा को लेकर दुविधा ओर सामाजिक सरोकार की ये उत्कृष्ट फिल्म थी। इस फिल्म में तमिल युवक द्वारा हिंदी सीखने के दौरान शिक्षिका द्वारा बताया जाना कि---" हिंदी बहुत मीठी होती है" हिंदी के प्रति भले ही ये फिल्मी संवाद था लेकिन वास्तविकता थी कि वास्तव में हिंदी बहुत ही मीठी भाषा है। सम्पुष्ट, अपने आप मे संपूर्णता लिए हुए।व्यकरण की अपरिमित विस्तार के साथ शब्दो के जोड़ से बने हर वस्तु के नाम के साथ उनके अनुलोम, विलोम, अर्थ के साथ हिन्दी अत्यंत ही सम्रद्ध भाषा है। हिंदी है हम

14 Sep 2021 02:39AM,
by: Babuaa Desk
Generic placeholder image

एक ईश्वर के रूप को आकार देकर आज़ादी की लड़ाई को संगठित करनेवाले बाल से गंगा धर औऱ उस पर भी तिलक याने बाल गंगाधर तिलक के ऋण को ये देश आज़ादी के पहले से लेकर आज तक और आनेवाले सदियों तक नही चुका पायेगा। तिलक ने सभा सम्मेलनों के लिए सार्वजनिक रूप से प्रथम पूज्य ईश्वर की स्थापना की शुरुवात की औऱ आज़ादी के मतवालों ने धर्म से डराने वालो को ही भयभीत करके रख दिया। कालांतर में इसी परम्परा ने आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां पर आप सभी को मानना होगा कि आजादी की लड़ाई में बाल गंगाधर तिलक की भूमिका चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह, राजगुरू, बटुकेश्वर दत्त विपिनचन्द्र पाल लाला लाजपतराय के बराबर थी जिनके प्रयासो से ये देश आजाद हुआ था। आज़ादी के बाद हर पूजा में प्रथम पूज्य के सार्वजनिक औऱ निजी स्थापना की परंपरा अनवरत जारी है। लोकमान्य और सर्वमान्य

10 Sep 2021 05:39AM,
by: Naveen kumar sahu
Generic placeholder image

मुझे तो एतराज है ,आपको भी होना चाहिए आज राजधानी से प्रकशित होने वाले लगभग सभी समाचारपत्रों ने एक शीर्षक :"सीएम के ........" लगाकर एक खबर प्रकाशित किया है। ये शीर्षक हर उस व्यक्ति को व्यथित करनेवाला होना चाहिए जो सामाजिक है। जिसके पिता है, भाई है, या अन्य चाचा,मामा, या अन्य रिश्ता है। यह शीर्षक हर राजनैतिक सरोकार रखने वाले को व्यथित करने वाला होना चाहिए साथ ही संविधान की जानकारी रखनेवाले अधिवक्ताओं सहित जागरूक व्यक्तियों को भी चिंता करने वाला होना चाहिए। सबसे पहले तो हमे ये समझना चाहिए कि सीएम या मुख्यमंत्री पद सामाजिक या राजनैतिक पद नही है बल्कि भारत के संविधान की धारा 163 (1) के तहत राज्यपाल को उसके कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता औऱ सलाह देने के लिए बने मंत्री-परिषद का प्रधान पद है जिसे सीएम या मुख्यमंत्री कहा गया है। संविध में जितने भी संवैधानिक पद है उनके बारे में उनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक अवधारणा का उल्लेख नही है। इस आधार पर मुख्यमंत्री पद पर आसीन व्यक्ति की सिवाय संवेधानिक पद के अलावा कोई सामाजिक अवधारणा नही की जा सकती है। इस अवधारणा से परे जाकर समाचार पत्रों में शीर्षक लगा दिया गया। मुख्यमंत्री के पिता

08 Sep 2021 05:17AM,
by: Naveen kumar sahu
Generic placeholder image

 बचपन छोड़ किशोरावस्था में जब लाइब्रेरी में समाकहा पत्रो,कहानी की पुस्तकों के लिए इंतजार करने की बेबसी हुआ करती थी तब आल्मारियो में करीने से रखी किताबो के शीर्षक पढ़कर समय बिताना भी एक काम हुआ करता था। इन्ही किताबो में एक किताब का शीर्षक मन को लुभाता भी था और उत्सुकता के दायरे में ले जाकर खड़ा भी करता था। ये किताब थी रसीदी टिकट।वक़्त के साथ वक़्त गुजरते गया। साहित्यिक चुल ने किताबो की संसार मे धकेला तो इस क्षेत्र के नामवर लोगो के नाम भी पता चलने लगा। इन्ही नामो में उस लेखिका का भी था जिन्होंने रसीदी टिकट लिखा था। आज उनकी 102 वी जयंती में सारा संसार याद कर रहा है। रसीदी टिकट

31 Aug 2021 06:08AM,
by: Naveen kumar sahu