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देश के नागरिकों की आम धारणा है कि व्यवस्थापिका औऱ कार्यपालिका के अधिकांश लोग संवैधानिक शपथ लेने के बावजूद आचरण के मायने में सद्चरित्र नही होते है। ईमानदारी से परे होकर अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करते है। आम आदमी अक्सर इस बात को भी सार्वजनिक रूप से कहता है कि व्यवस्थापिका से जुड़े लोग बिना ज्ञात कारोबार के ऐसा क्या कारोबार करते है कि इनका रहन सहन बदल जाता है। इनके बाद कारोबारियो का नाम आता है ।इनके लिए भी धारणा है कि आय कम बता कर व्यापार में अनुचित लाभ कमाते है। निजी क्षेत्र से जुड़े सेवा क्षेत्र में लोगो के प्रति भी आय को छुपाने का आरोप है। कुल मिला कर पूरी दाल काली होने की बात है। काली कमाई का गुलाबीपन

20 May 2023 10:41AM,
by: Babuaa Desk
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राजनीति में संवैधानिक व्यवस्था से परे भी अपनी अलग व्यवस्था बनाने का शगल है। इसे संतुलन का सिद्धांत कहा जाता है। दल के भीतर चाहे जातीय संतुलन हो या बाहुबल का संतुलन हो या फिर व्यक्तित्व का संतुलन हो, बराबर करना पड़ता है। इसे भीतर ही भीतर पनप सकने वाले असंतोष को ढाँकने की सफल कोशिश भी कहा जा सकता है। कर्नाटक अभी सुर्खियों का राज्य है कारण भी है । कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए भाजपा को चारों खाने चित्त की है। अप्रत्यक्ष रूप से बजरंग बली भी भाजपा के लिए सहयोगी न हो पाए। वैसे भी दक्षिण के राज्यो में उनके अपने इष्ट है जो हिंदी भाषी राज्यो से अलग है। कर्नाटक इसलिये भी चर्चित है कि पहली बार बंद कमरे के भीतर के समझौते के रूप में ढाई ढाई साल का फार्मूला सार्वजनिक हुआ है। काश ये साहस साढ़े चार साल पहले दिखा होता तो मध्यप्रदेश में अभी सिंधिया, राजस्थान में सचिन पायलट औऱ छत्तीसगढ़ में टी एस सिंहदेव के नाम के सामने मुख्यमंत्री लिखा होता। खैर, यदि ये सब होता तो काहे ज्योतिरादित्य सिंधिया पलायन करते, सचिन पायलट रैली निकालते औऱ टी एस सिंहदेव आलाकमान के भरोसे रहते।  उप" कृते" मुख्यमंत्री

20 May 2023 05:24AM,
by: Babuaa Desk
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लेखक समाज के लिए कैसा है ये लेखक के लेखन से पता चलता है। आम तौर पर लेखन के नाम पर दुनियां अनेक भागों में बटी हुई है। किसी को लगता है कि वह अभिव्यक्त होने की आज़ादी रखता है इसलिये उसके विचार से केवल सहमत या असहमत होना चाहिए लेकिन भावना को ठेस लगने की विपदा ने अच्छे अच्छे लोगो को कम से कम वैचारिक रूप से पुरुषार्थी तो नहीं रहने दिया है। सआदत हसन मंटो का दुर्भाग्य रहा कि वह उस युग मे जन्म लिया जिस युग मे "अश्लीलता" परिभाषित थी। स्त्री और पुरुष के जिस्मानी रिश्ते के शाब्दिक लेखन को श्लील ढंग से न लिखना ही अश्लीलता थी। सआदत हसन मंटो ने इसी प्रकार के दृश्यों को लेखांकित किया और बुद्धजीवी लेखकों के बिरादरी में अलग स्थान पर बैठे। दो देश का एक लेखक- सआदत हसन मंटो

13 May 2023 12:58AM,
by: Babuaa Desk