लेख

Generic placeholder image

भारत का पाकिस्तान या पाकिस्तान का भारत का कोई भी खेल के मैच में रोमांच से ज्यादा तनाव रहता है। दोनो देश के खिलाड़ियों से ज्यादा दोनो देश के लोग अपनी टीम को हारते हुए नही देखना चाहते। आज मेलबर्न में भारत और पाकिस्तान का टी20 विश्वकप में जो मैच हुआ वो रोलरकोस्टर से कम नही था। पहले अर्शदीप ने उम्मीद जगाई तो भारत दबाव बनाते दिखा उसके बाद शान मसूद(52) और इफ्तखार अहमद(51) ने तेज़ पारी खेली तो पलड़ा पाकिस्तान की तरफ झुकते दिखा। हार्दिक पांड्या ने 3 विकेट लेकर पाकिस्तान की पारी पर ब्रेक लगाया लेकिन तब तक 158 रन का अच्छा खासा लक्ष्य भारत के सामने खड़ा हो गया था। जैसे पाकिस्तान की पारी लड़खड़ाई थी उससे ज्यादा भारत लुढ़का महज 31 रन पर चार शीर्ष बल्लेबाज राहुल, रोहित,सूर्यकुमार सहित अक्षर पटेल वापस हो गए थे। सांसे थमने लगी थी और संभावित हार आंख के सामने दिखने लगी थी। 10 ओवर के खत्म होने के बाद केवल 44 रन बने थे।विराट और हार्दिक ने 11 वे ओवर से जो रफ्तार पकड़ना शुरू किया तो दोनों ने 113 रन जोड़े जिसमे 40 रन हार्दिक के थे 73 रन विराट कोहली के थे। पिछले 3-4 सालों से विराट पर भरोसा कम ही रह गया था। यद्यपि पिछले कुछ महीनों से वे ठीक ठीक खेल रहे थे लेकिन पाकिस्तान के खिलाड़ी भारत के खिलाफ 120 % दम लगाकर खेलते है इस कारण दिल धक धक तो कर रहा था। आखरी 4 ओवर में 48 रन का पीछा करना आसान नही था लेकिन विराट ने बहुत समय के बाद बताया कि उनमें प्रेशर के बीच खेलने की ताकत अभी बाकी है। 53 बाल में 82 नाबाद रन की अद्भुत पारी ने देश सहित क्रिकेट प्रेमियों का शानदार मनोरंजन किया ।खासकर 19 वे ओवर में लगाये गए2 छक्के मैच के खूबसूरत शॉट थे। आखिरी ओवर तो मानो रोमांच का भी आखिर ओवर था। हार्दिक का आउट होने, छक्का पड़ना,, नो बॉल होना, नो बॉल में 3 रन दौड़ना, दिनेश कार्तिक का आउट होना, वाइड बाल , फिर अश्विन का जीत वाला रन लेना,सब कुछ जीत और हार के बीच घूमने वाला पेंडुलम बन गया था। कभी भारत की तरफ पलड़ा झुकता तो कभी पाकिस्तान की तरफ लेकिन अंततः जीत रोहित की भारतीय टीम के हिस्से में आई। शानदार मैच था, शानदार शुरुआत हुई तो शानदार ढंग से मैच खत्म हुआ। विराट ने बहुत दिन बाद विराट पारी खेली वो भी धुकधुकी बढ़ाने वाली, वैसे भी कोहली को खुद को पुनः स्थापित करने के लिए स्थापित टीम के खिलाफ ही खेल दिखाना था। आज वे 140 करोड़ देश वासियों को दीवाली का अग्रिम उपहार के रूप में नायाब पारी का तोहफा दिया है। देश के फटाके वाले खुश है कि दीवाली के लिए खरीदे गए फटाके तो आज काम आ गए है। दीवाली के लिए फिर खरीदी करनी पड़ेगी। आज की जीत से देश में त्यौहार का माहौल और खुशनुमा हो गया है। वजह विराट कोहली है। सवाल ये नहीं कि हम जीते सवाल ये है कि हम कैसे जीते?

23 Oct 2022 03:01PM,
by: Babuaa Desk
Generic placeholder image

हिंदुस्तान के सबसे अमीर खेल कहे जाने वाले क्रिकेट के प्रबंधन के लिए बने संगठन बोर्ड ऑफ क्रिकेट कन्ट्रोल इन इंडिया(BCCI) के 36 वे अध्यक्ष के रूप में 1983 के प्रूडेंशियल कप विश्वविजेता भारतीय क्रिकेट टीम के एक ऐसे गेंदबाज का चयन हुआ है जिसने तीसरे एकदिवसीय विश्वकप आयोजन में सर्वाधिक 18 विकेट लिए थे। ये खिलाड़ी है रोजर बिन्नी, जिन्हें खिलाडी के रूप में बोर्ड की कप्तानी( अध्यक्षता) सौपी गयी है। देश मे जितने भी खेल संघ है उनके किसी भी संघ के अध्यक्ष का सलाना मानदेय 5 करोड़ नही है, ऐसे में 3 साल के लिए अध्यक्ष बने रोजर बिन्नी 15 करोड़ की धनराशि लेकर निकलेंगे। दरअसल खेल की दुनियां में हमेशा से खिलाड़ियों के सर पर बेफिक्री के हाथ होने की परंपरा रही है। पहले तो साधन सम्पन्न लोग "खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब" के समर्थक है और "पढ़ लिख कर नवाब ही बनना बेहतर" समझते है। ये भी माना जाता है कि खेल की दुनियां में मेहनतकश लोग ही मुकाम बनाते है जो अभाव में पलते है। आमतौर पर खिलाड़ी पढ़ाई लिखाई के मामले में कमजोर ही होता है क्योंकि ध्यान ही खेल में लगा होता है। ऐसे लोगो के लिए राजशाही काल से प्रश्रय का सिद्धांत प्रचलन में है। राजशाही खत्म हुई प्रजातंत्र आया तो राजनीति से संबंध रखने वालों ने सिर पर हाथ रखा, उनसे भी आगे उद्योगपति भी अपने को सार्वजनिक जीवन मे स्थापित करने के लिए खेल संगठनो का सहारा लिया और फायदा ये हुआ कि खिलाड़ी अपने प्रबंधन के मामले में बेफिक्र होकर आगे बढ़ते गए।  बीसीसीआई के खिलाड़ी अध्यक्ष

19 Oct 2022 06:29AM,
by: Babuaa Desk
Generic placeholder image

उन्नीस सौ सत्तर के दशक में फिल्म इंडस्ट्री में पुरानी नायिकाओं का दौर खत्म होने का था साथ ही नायक भी उम्रदराज़ होते जा रहे है, ऐसे में नायक को कम उम्र का दिखाने के लिए कम उम्र की नायिकाओं को लाने का काम शुरू हुआ।राजकपूर सपनो का सौदागर फिल्म के समय 54 साल के हो गए थे उनके लिए दक्षिण भारत की एक नायिका तलाशी गयी जिसकी उम्र 24 साल कम थी। इस नायिका को मुंबई में नए अंदाज में दर्शकों के सामने लाया गया। पूरे मुंबई के बिजली के खम्बो में पोस्टर लगाया गया कि एक नई नायिका आ रही है जो सपने में आने वाली लड़की है। इसे नाम दिया गया - ड्रीम गर्ल। फिल्म का नाम था सपनो का सौदागर। फिल्म तो नही चली लेकिन उत्तर के नायकों के लिए दक्षिण की नायिका के रूप में हेमा मालिनी की गाड़ी चल निकली। हेमा मालिनी की एक खासियत थी कि उन्होंने परिधान के नाम पर कभी भी समझौता नहीं किया। अंग प्रदर्शन के लिए उन्होंने फिल्में छोड़ना बेहतर समझा और उनके इसी आदत के चलते वे तब के बाद से हर बड़े नायक की नायिका बनी। देखा जाए तो हेमा मालिनी दो युग के नायकों के बीच की संधि थी। एक तरफ राजकपूर, देवानंद, राजेन्द्र कुमार, देवानंद, राजकुमार,शम्मी कपूर,मनोज कुमार और शशि कपूर के साथ काम किया तो दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, जितेंद्र, रणधीर कपूर,राजेश खन्ना के साथ भी फिल्में की। उनकी फिल्मों में वे फिलर भी नही हुआ करती थी बल्कि सशक्त भूमिका उनके लिए लिखी गयी। एक फिल्म उनके लिए चयनित उपनाम "ड्रीम गर्ल" भी बनी जिसमे एक गाना भी किसी शायर की ग़ज़ल ड्रीम गर्ल भी लिखा गया। जिस जमाने मे हेमा मालिनी ने फिल्म जगत में प्रवेश किया था तब वास्तव में वे स्वप्न सुंदरी ही थी। किसी शायर की ग़ज़ल -ड्रीम गर्ल

16 Oct 2022 10:48AM,
by: Babuaa Desk
Generic placeholder image

हिंदी फिल्मों में दर्शक केवल देखने नहीं सुनने भी जाता है - इस बात को ध्यान में रखकर पटकथा में संवाद की अहम भूमिका होती है। कहानी के पात्रों को भूमिका देने के साथ साथ उनके संवाद लिखने का काम अलग होता है। नायकों को ध्यान में रख कर ही संवाद लिखे जाते है, पर जब फिल्मों में राजकुमार रहते थे तो उनके लिए संवाद भी दमदार लिखने का दबाव पटकथा लेखकों को रहा करता था। यहां तक कि फिल्म में राजकुमार का नाम और पद का भी विशेष ख्याल रखना पड़ता था। तिरंगा फिल्म में वे सेना के अधिकारी बने थे पहले नाम पढ़ ले - सूर्यदेव सिंह, पद ब्रिगेडियर- थल सेना के मेजर जनरल से नीचे का पद जिसके मातहत 3000-5000 सैनिक ब्रिग्रेड में रहते है।"सूर्या" फिल्म में नाम- राजपाल चौहान, पद- कलेक्टर। बुलन्दी नाम प्रो सतीश कुमार( तब प्रो सतीश धवन, अंतरिक्ष विज्ञान के प्रमुख थे)। इन चंद उदाहरणों से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि राजकुमार की हैसियत फिल्म इंडस्ट्री में क्या थी। यहां के हम है राजकुमार

08 Oct 2022 06:34AM,
by: Babuaa Desk
Generic placeholder image

कल गली, चौराहे सहित मैदानों में लघु आकार से लेकर मध्यम और ऊंचे रावणो का दहन हुआ। कई स्थानों के पूर्ववर्ती रावणो से और ऊंचा रावण स्थापित हुआ। रावण दहन को देखने हर स्थान पर लोग जुटे। बुराई पर अच्छाई की जीत जो होना था। रावण को जलते देखने वाले व्यक्ति में उस क्षण के लिए भगवान राम समाहित हुए होंगे और जैसे ही रावण का ढांचा भरभरा कर गिरा होगा राम अंर्तध्यान हो गए होंगे कदाचित रावण पुनः अपना वजूद बनाकर साथ घर वापस आ गया । हर साल रावणो के दहन के बाद भी राम का रंग क्यो नही चढ़ पा रहा है ? ये प्रश्न मन को कुरेदे हुए था। मन में ये अंतर्द्वंद्व भी घण्टो चलते रहा कि एक व्यक्ति जिसने ब्राह्मण होने के कारण वेद, पुराण को कंठस्थ किया, पुरोहिती का अद्भुद ज्ञानी होने के साथ साथ शिव तांडव का लेखक रहा। राजकीय कुशाग्रता इतनी थी कि राज्य सोने की लंका कहलाती थी, इस व्यक्ति ने ऐसा कौन सा कृत्य किया जिसके चलते ये बुराई का स्थायी ब्रांड बन गया है। इसका दहन कर देने का अर्थ ही बुराई पर अच्छाई की जीत हो जाना माना जा रहा है। एक ही बुराई दिखी रावण के सम्पूर्ण जीवन मे- ये बुराई थी एक स्त्री के अपहरण का। भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 364 में इस अपराध के प्रमाणित होने पर 7 साल की सज़ा का प्रावधान है। अगर आज की स्थिति में रावण ऐसा किया होता तो। हर जगह रावण से बड़े अत्याचारी जिंदा है

06 Oct 2022 04:55AM,
by: Babuaa Desk
Generic placeholder image

उपकार फिल्म पूर्व प्रधानमंत्री परम आदरणीय स्व.लाल बहादुर शास्त्री जी की परिकल्पना की वास्तविकता थी। जय जवान जय किसान के नारे को लेकर मनोजकुमार की इस फिल्म में इंदीवर का लिखा एक अमर गीत में " रंग बना बसंती भगतसिंह" का उल्लेख है। आज इसी भगतसिंह का जन्मदिन है। जिसे और सालो की तुलना में इस साल भव्यता के साथ मनाया जा रहा है। बीते सालों में अमर भगतसिंह के जन्मदिन पर समाचार पत्रों में विज्ञापन नहीं दिखते थे लेकिन इस साल पूरे पृष्ठ पर वे अवतरित हुए है।ये एक अच्छा प्रयास है।इसकी सराहना होनी चाहिए। भगतसिंह, आज के युग मे कैसे प्रासंगिक बन पाए इसके लिए समाज को प्रयास करना चाहिए। रंग बना बसंती भगत सिंह

28 Sep 2022 05:21AM,
by: Babuaa Desk